उपदेश | मूर्तिपूजा

मूर्तिपूजा

एक बार महाराज ने स्वामी विवेकानन्दजी से प्रश्न किया-“देखिये, स्वामीजी ! मूर्तिपूजा में मेरा रत्ती भर भी विश्वास नहीं है। इसके लिए मुझे क्या दण्ड मिलेगा ?”

उपदेश | मूर्तिपूजा

स्वामीजी ने उत्तर दिया- “अपने विश्वास के अनुसार उपासना करने पर परलोक में दण्ड क्यों मिलेगा, मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं है, तो न सही।” वहां बैठे अन्य भक्तजन स्वामीजी के इस उत्तर से बड़े असमन्जस में पड़े। वे सोचने लगे-स्वयं तो स्वामीजी मूर्तिपूजा करते हैं, भगवान् की प्रतिमा को देखकर ही भाव-विभोर होकर अश्रुविमोचन करने लगते हैं और इसे अनावश्यक भी बता रहे हैं। इतने में स्वामीजी की दृष्टि उस कक्ष में टंगे महाराज की एक फोटो पर पड़ी। स्वामीजी ने उस चित्र को उतरवाया और हाथ में लेकर दीवान साहब से पूछा- “क्या यह महाराज की ही फोटो है?” दीवान ने स्वीकृति सूचक सिर हिला दिया।

स्वामीजी ने दीवान महोदय से कहा- “ज़रा इस चित्र पर थूक दीजिये।” दीवानजी अवाक् होकर स्वामीजी की ओर देखने लगे। स्वामीजी ने सभी उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा – “आपमें से कोई इस पर थूक दीजिये। यह एकमात्र काग़ज़ का टुकड़ा ही तो है।” कोई कुछ नहीं बोला। किसी ने नहीं थूका। दीवानजी बोले-“स्वामीजी ! आप क्या कह रहे हैं। हम महाराज के चित्र पर कैसे थूक सकते हैं।”

“महाराज का चित्र होने से इसमें महाराज का कौन-सा गुण-कर्म स्वभाव आ गया है। यह तो काग़ज़ का टुकड़ा-भर है। इसमें प्राण तो नहीं हैं। फिर भी इस पर आप सबको थूकने में संकोच क्यों हो रहा है।” फिर हंसते हुए बोले-“मैं जानता हूं, आप इस पर थूक नहीं सकेंगे; क्योंकि आप लोग समझ रहे हैं कि इस पर थूकने से महाराज के प्रति असम्मान प्रकट होगा। है न यही बात ?” अब स्वामीजी ने महाराज को लक्ष्य करके कहा-“देखिये

हाराज! एक दृष्टि से विचार करने पर यह काग़ज़ के टुकड़े पर आपका अस्तित्व है। यही कारण है कि सब लोग आपको तथा आपके चित्र को एक ही मान रहे हैं। ठीक उसी प्रकार पत्थर या धातु की बनी प्रतिमाएं भी भगवान् को विशेष गुणवाचक मूर्तियां हैं। उनके दर्शन से ही भक्त के मन में भगवान् की स्मृति जाग उठती है। भक्त मूर्ति के माध्यम से भगवान् की ही उपासना करते हैं। धातु या पत्थर की पूजा नहीं करते। मैं अनेक मन्दिरों, तीर्थों में घूमा हूं, पर आज तक किसी को यह कहते नहीं सुना है कि ‘हे पत्थर ! हे धातु ! मैं तुम्हारी पूजा कर रहा हूं।” सभी एकमेव अद्वितीय परब्रह्म को अपने-अपने भाव के अनुसार पूजते हैं।”

स्वामीजी की इस प्रकार की प्रामाणिक सोदाहरण बातों से प्रभावित होकर अलवर-नरेश करबद्ध होकर बोले- “महाराज ! आपकी कृपा से आज मुझे मूर्तिपूजा के सम्बन्ध में एक नया तत्त्वज्ञान प्राप्त हुआ है।”

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