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स्वामी विवेकानन्दजी अपने जीवन का एक घटना सुनाते हुए कहते हैं-

 एक बार में काशी में किसी जगह जा रहा था। उसी जगह एक तरफ काफ़ी जलाशय और दूसरी ओर ऊंची दीवार थी। उस स्थान पर बहुत से बन्दर रहते थे। काशी के बन्दर बड़े दुष्ट होते हैं। अब उनके मन में यह विचार पैदा हुआ कि मुझे उस रास्ते पर से न जाने दें। वे विकट चीपुकार करने लगे और झट आकर मेरे पैरों से चिपटने लगे।

 उन्हें निकट देखकर मैं भागने लगा। किन्तु मैं जितना ज्यादा ज़ोर से दौड़ने लगा, वे उतनी ही अधिक तेज़ी से आकर मुझे काटने लगा। उनके हाथ से छुटकारा पाना असम्भव प्रतीत होने लगा। ऐसे ही समय एक अपरिचित ने आकर मुझे आवाज़ दी – “बन्दरों का सामना करो।” मैं भी जैसे ही उलटकर उनके सामने खड़ा हुआ, वैसे ही वे पीछे हटकर भाग गये। समस्त जीवन में जो कुछ भी भयानक है, उसका हमें सामना करना पड़ेगा, साहसपूर्वक उसके सामने खड़ा होना पड़ेगा। 

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 यदि हमें मुक्ति या स्वाधीनता का अर्जन करना हो, तो प्रकृति को जीतने पर ही हम पायेंगे, प्रकृति से भागकर नहीं। कायर पुरुष कभी विजय नहीं पा सकता। हमें भय, कष्ट और अज्ञान के साथ संग्राम करना होगा, तभी वे हमारे सामने से भागेंगे।

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