शिष्टाचार | स्वामीजी बोलने के लिए खड़े हुए और उन्होंने ‘अमरीकावासी बहिनों और भाइयों’ शब्दों के साथ जनता क

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Mar 3, 2024 #अधिक समय के लिए भाषण देना और प्रतिक्रिया, #अनुभवों का विश्वसनीयता से प्रस्तुतिकरण, #अमरीका में धार्मिक सम्मेलन, #धर्मिक नेतृत्व और आध्यात्मिक अध्ययन, #भारतीय धार्मिकता का अमरीका में प्रसार, #भारतीय संस्कृति और शिष्टाचार, #भाषण के आत्मविश्वास और लोकप्रियता, #युवा दिवसः स्वामी विवेकानंद का वो भाषण जिसने दुनिया को हिलाकर, #वसुधा को अपना कुटुम्ब मानना, #शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन, #सन् 1893 में शिकागो में विश्वधर्म सम्मेलन चल रहा था। स्वामी विवेकानन्द भी, #संन्यासी की स्थानिकता और उनका प्रभाव, #सामाजिक उत्थान के लिए धार्मिक विचार, #सांस्कृतिक सम्मेलन और सामाजिक परिवर्तन, #स्वामी विवेकानन्द के भाषण, #हिन्दू धर्म और स्त्री सम्मान
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सन् 1893 में शिकागो में विश्वधर्म सम्मेलन चल रहा था। स्वामी विवेकानन्द भी उसमें बोलने के लिए गये हुए थे। 11 सितम्बर को स्वीमीजी का व्याख्यान होना था। मंच पर ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ था- ‘हिन्दू धर्म-मुर्दा धर्म।”

स्वामीजी बोलने के लिए खड़े हुए और उन्होंने ‘अमरीकावासी बहिनों और भाइयों’ शब्दों के साथ जनता को सम्बोधित किया। स्वामीजी के मुंह से ये शब्द निकले नहीं कि सभा में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ गयी। श्रोताओं ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया और तालियों की गूंज कई मिनट तक थमी नहीं।

इस हर्ष का कारण यह था कि इस प्राच्य संन्यासी ने स्त्रियों को पहले स्थान दिया था और सारी वसुधा को अपना कुटुम्ब मानकर सबका स्वागत किया था। भारतीय संस्कृति में निहित शिष्टाचार का यह तरीका किसी को सूझा नहीं था। इस बात का अच्छा असर पड़ा। जनता मुग्ध भाव से उनको सुनती रही। बोलने के लिए निर्धारित 5 मिनट की अवधि कब बीत गयो, लोग मन्त्रमुग्ध से बंधे बैठे रहे और उनसे बोलते रहने के लिए अध्यक्ष कार्डिनल गिबन्स ने अनुरोध किया। स्वामीजी 20 मिनट से भी अधिक देर तक बोलते रहे।

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स्वाभोजो की सारे अमेरिका में धूम मच गयी। अखबारों ने अपने-अपने पुल पर लिखा कि आज तक अमेरिका की धरती पर ऐसा कोई अद्भुत पुरुष नहीं आया। देखते-ही-देखते हज़ारों उनके शिष्य बन गये। और तो और सम्मेलन में कभी शोर-शराबा मचता, तो यह कहकर ओं को शान्त कराया जाता कि आप चुप रहेंगे, तो स्वामी विवेकानन्द का आयान आपको सुनने का अवसर दिया जायेगा। सुनते ही सारी जनता सांस रोककर बैठ जाती।

अपने व्याख्यान से स्वामीजी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू धर्म ही सर्वश्रेषा धर्म है, जिसमें सभी धमों को अपने अन्दर समाहित करने की क्षमता है। भारतीय संस्कृति ‘सर्व धर्म समभाव’ का अनुपालन करती है। किसी की किन्दा या अवमानना नहीं और इस तरह इस अद्भुत संन्यासी ने सात समुद्र पार भारतीय संस्कृति को ध्वजा फहरायी।

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