सूक्तियां एवं सुभाषित | Swami vivakanand

संख्या अधिक होने से धन और दरिद्रता को उलट सकते हैं। बाधा जितनी अधिक हो, उतना ही अच्छा है। बाधा बिना पाये क्या कभी नदी का वेग बढ़ता है? बाधा ही सिद्धि पाने का पूर्व लक्षण है।

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मस्तिष्क और मांसपेशियों का बल साथ ही बढ़ना चाहिए। बलवान् शरीर के साथ तीव्र बुद्धि हो, तो सारा संसार पदावनत हो सकता है।

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मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध युद्ध और संघर्ष करता है, अनेकों कष्ट भोगता है, लेकिन अन्त में विजय प्राप्त करता है और अपनी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। जब वह मुक्त हो जाता है, तब प्रकृति उसकी दासी बन जाती है।

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इतना जान लेना, संसार में तू जीवित है या मर गया है, इससे तेरे स्वजनों को कोई विशेष हानि नहीं है। तू यदि कुछ धन-सम्पत्ति छोड़कर जा सका, तो देख लेना तेरी मृत्यु से पहले ही उस घर में डण्डेबाजी शुरू हो जायेगी। तेरी मृत्युशय्या पर तुझे सांत्वना देने वाला कोई नहीं है-स्त्री-पुत्र तक नहीं।

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मनुष्य ही तो रुपया पैदा करता है। रुपये से मनुष्य पैदा नहीं होता है। यह भी कभी नहीं सुना है? यदि ‘तू’ अपने मन और मुख को एक कर सके तथा वचन और क्रिया को एक कर सके, तो धन आप ही तेरे पास जलवत् बह आयेगा।

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वायु के वायुतत्त्व को, यम के यमत्व को अपने-अपने स्थान पर रख छोड़ा है, अपनी-अपनी सीमा से किसी को बाहर नहीं जाने देता है।

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दुःख और कष्ट आदमी में अपने अन्दर नहीं होते हैं, वे तो ऐसे हैं, जैसे भागते हुए बादल, जो सूर्य पर अपनी परछाईं डालते हैं, बादल तो हट जाता है, किन्तु सूर्य अपरिवर्तित रहता है। ठीक यही नियम व्यक्ति के साथ भी लागू होता है। वह उत्पन्न नहीं होता, न ही वह मरता है।

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समस्त कठिनाइयों को पूर्णतया न तो धन दूर कर सकता है, न यश और न ही विद्या। चरित्र ही कठिनाई रूपी पत्थर की दीवार को छेद सकता है।

इच्छाशक्ति, विराट् और स्वतन्त्रता के सामने सभी प्रकार की शक्तियां अपना सिर झुका देती हैं।

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जो शास्त्रों को पढ़कर उनका अपने जीवन में आचरण नहीं करते, उन पर यह बात पूरी तरह लागू होती है- यथा खरश्चंदन भारवाही, भारस्य वेत्ता न तु चंदनस्य, जिस प्रकार गधा अपनी पीठ पर लदे चंदन के भार को जानता है, उसके मूल्य को नहीं।

याग-यज्ञ, प्रणाम-दण्डवत् और जप-जाप आदि धर्म नहीं हैं। वे वहीं तक अच्छे हैं, जहां तक वे हमें सुन्दर और वीरतापूर्ण कार्य करने की प्रेरणा देते हैं तथा हमारे विचारों को इतना उन्नत बना देते हैं, जिससे हम देवी पूर्णता की धारणा कर सकें।

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भारतीय शिक्षा की किसी समस्या को हल करने के लिए सर्वप्रथम शिक्षक के नित्यप्रति के सामान्य कार्य का अनुभव होना आवश्यक है और इसके लिए शिक्षार्थी की आंखों से संसार की ओर चाहे वह क्षण-भर के लिए क्यों न हो-देखते रहना, सबसे बड़ा और वांछनीय गुण है। शिक्षाशास्त्र का प्रत्येक सूत्र इसी सत्य की घोषणा करता है। शिक्षार्थी की आकांक्षाओं के विपरीत शिक्षा देना, भलाई की अपेक्षा दुष्परिणामों का निश्चित रूप से आह्वान करना है।

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मनुष्य तभी तक मनुष्य है, जब तक वह प्रकृति से ऊपर उठने के लिए संघर्ष करता रहता है। यह प्रकृति दो प्रकार की है- अन्तर और बाह्य। बाह्य प्रकृति को अपने वश में कर लेना बड़ी अच्छी और गौरव की बात है, पर अन्तःप्रकृति पर विजय पा लेना, उससे भी अधिक गौरव की बात है। ग्रहों और तारों का नियमन करने वाले नियमों का ज्ञान प्राप्त कर लेना गौरवपूर्ण है, पर मानव जाति की वासनाओं, भावनाओं और इच्छा का नियमन करने वाले नियमों को जान लेना उससे अनन्तगुना अधिक गौरवपूर्ण है।

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आज धर्म संसार में केवल एक निर्जीव उपहास, प्रहसन मात्र रह गये हैं। आज विश्व को महान् चरित्र के लोगों की आवश्यकता है।

तुम जैसा बनना चाहोगे, वैसा बन जाओगे। इसी प्रकार जैसा तुम अपने को अनुभव करोगे, वैसा हो जाओगे। यदि तुम अपने को निर्बल समझते हो, तो निःसन्देह तुम दुर्बल हो जाओगे और इसके विपरीत यदि तुम अपने को शक्तिशाली मानते हो, तो तुम बलवान् व्यक्तियों की गिनती में एक दिन आ जाओगे।

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 एक ओर तो भारतीय लोग कहते हैं- पाश्चात्य भाव, वेशभूषा तथा खान-पान का सहारा लेने से ही हम लोग विभिन्न देशों एवं जातियों के समान शक्तिशाली हो सकते हैं, लेकिन दूसरी ओर हम कहते हैं कि दूसरों की नकल करने से आज तक कोई भी व्यक्ति उन्नति नहीं कर सका है।

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हर एक व्यक्ति प्रभुत्व जताना चाहता है, पर आज्ञापालन करने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता। पहले आज्ञा का पालन करना सीखो, आदेश अथवा आज्ञा देना तो फिर स्वयं ही आ जायेगा। पहले सर्वदा दास होना सीखो, तभी तुम प्रभु हो सकोगे।

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जिस कार्य से पशु, मनुष्य तथा मनुष्य परमात्मा बन सकता है, वह है- धर्म।

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 मुझे अपने मानव-बन्धुओं की सहायता करने दो-मैं बस यही चाहता हूं।

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प्रत्येक कर्मफल भले और बुरे का मिश्रण है। ऐसा कोई भी शुभ कर्म नहीं है, जिसमें अशुभ का संस्पर्श न हो। आग के चारों ओर व्यास धुएं के समान कर्म में सदैव कुछ-न-कुछ अशुभ लगा ही रहता है। हमें ऐसे कार्यों में रत होना चाहिए, जिनसे भलाई अधिक-से-अधिक मात्रा में हो और बुराई कम-से-कम।

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यदि आत्मा के जीवन में मुझे आनन्द नहीं मिलता, तो क्या मैं इन्द्रियों के जीवन में आनन्द पाऊंगा ? यदि मुझे अमृत नहीं मिलता, तो क्या मैं गढ़े के पानी से प्यास बुझाऊं ?

संसार में आकर जो मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करता है, उसके लिए उसे अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं। तब कहीं वह सफलता की चरम सीमा पर पहुंचता है, अर्थात् अन्त में प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेता है और अपनी मुक्ति प्राप्त कर लेता है और जब वह मुक्त हो जाता है, तब प्रकृति स्वयं उसकी दासी बन जाती है।

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सुर और असुर में केवल इतना ही भेद है, जितना स्वार्थ और निःस्वार्थ में। असुर भी सुर के समान ही है। अन्तर केवल इतना है कि उनमें पवित्रता नहीं है, इसलिए वे असुर हैं। सुरों में पवित्रता है, इसलिए वे सुर हैं।

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निःस्वार्थ सेवा ही धर्म है और बाह्यविधि, अनुष्ठान आदि केवल पागलपन है। अपनी मुक्ति की अभिलाषा करना भी अनुचित है।

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सारी उपासना का सार है- पवित्र होना और दूसरों की भलाई करना। जो शिव को दीन-हीन में, दुर्बल में और रोगी में देखता है, वही वास्तव में शिव की उपासना करता है और जो शिव को केवल मूर्ति में देखता है, उसकी उपासना तो केवल प्रारम्भिक है।

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धर्म का थोड़ा-सा अनुष्ठान करने से भी महाभय से रक्षा तथा भगवान् की प्राप्ति होती है।

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यदि भगवान् को प्राप्त करना चाहते हो, तो काम-कांचन का त्याग पहले करना होगा। क्योंकि जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश एक साथ नहीं रह सकते, उसी प्रकार काम और भगवान् का मेल असम्भव है।

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मानव-देह मन्दिर में प्रतिष्ठित मानव-आत्मा ही एकमात्र पूजार्थ भगवान् है। अवश्य, समस्त प्राणियों की देह भी मन्दिर है, पर मानव-देह सर्वश्रेष्ठ है, वह मन्दिरों में ताजमहल है। यदि मैं उसमें भगवान् की पूजा न कर सकूं, तो और कोई भी मन्दिर किसी काम का न होगा।

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बहता पानी और रमते योगी ही शुद्ध रहते हैं।

 

आह ! कितना शान्तिपूर्ण हो जाता है उस व्यक्ति का कर्म जो मनुष्य की ईश्वरता से समुच अवगत हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता, सिवा इसके कि वह लोगों की आंखें खोलता रहे। शेष सब अपने आप हो जाता है।

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उन (श्रीरामकृष्ण) को वह महान् जीवन जीने मात्र में ही सन्तोष था। उसकी व्याख्या की खोजबीन उन्होंने दूसरों पर छोड़ दी थी।

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जो संन्यासी कांचन के बारे में सोचता, उसकी इच्छा करता है, वह आत्मघात करता है।

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हम न तो दुःख की उपासना करते हैं, न सुख की। हम उनमें से किसी के द्वारा भी उन दोनों से परे की स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं।

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ये सब (दिव्य दर्शन आदि) गौण विषय हैं। वे सच्चे योग नहीं हैं। अप्रत्यक्ष रूप से ये हमारे वक्तव्यों की सत्यता की पुष्टि करते हैं, इस कारण इनकी कुछ उपयोगिता हो सकती है। एक छोटी-सी झलक भी यह विश्वास प्रदान करती है कि इस स्थूल पदार्थ के पीछे कोई चीज है। किन्तु जो इनके लिए समय देते हैं, वे बड़े खतरे मोल लेते हैं।

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प्रेम सदैव आनन्द की अभिव्यक्ति है। इस पर दुःख की तनिक भी छाया पड़ना सदैव शरीरपरायणता और स्वार्थपरता का चिह्न है।

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मैं यूनानी देवताओं की भी उपासना नहीं करूंगा; क्योंकि वे मानवता से पृथक थे। केवल उन्हीं की उपासना करनी चाहिए, जो हमारे समान, परन्तु हमसे महान् हों। देवताओं और मुझमें केबल परिमाण का अन्तर होन्स चाहिए।

देह में शक्ति नहीं, हृदय में उत्साह नहीं, मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं-क्या होगा रे इन जड़ पिण्डों से ? मैं हिला-डुलाकर इनमें स्पन्दन लाना चाहता हूं। वेदान्त के अमोघ मन्त्र से मैं इन्हें जगाऊंगा। उठो, जागो, इस कथन को सिद्ध करने के लिए ही मैंने जन्म लिया है।

तुम सदैव कह सकते हो कि प्रतिमा ईश्वर है। केवल यही सोचने की भूल से बचना कि ईश्वर प्रतिमा है।

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सगुण ईश्वर, केवल मानव आत्माओं का ही नहीं, प्रत्युत् सभी आत्माओं का पूर्ण योग है। पूर्ण की इच्छा का विरोध कोई नहीं कर सकता। इसी को हम नियम कहते हैं। यही ‘शिव’ और ‘काली’ इत्यादि का अर्थ है।

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जितनी अधिक मेरी आयु होती जाती है, उतना ही अधिक मुझे लगता है कि पौरुष में सभी बातें शामिल हैं। यह मेरा नया सन्देश है।

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अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों के लिए आन्दोलन करो, लेकिन याद रखो कि जब तक देश में आत्सम्मान की भावना उत्कटता से नहीं जगाते और अपने आपको सही तौर पर नहीं उठाते, तब तक हक और अधिकार प्राप्त – करने की आशा केवल अलनस्कर (शेखचिल्ली) के दिवास्वप्न की तरह रहेगी।

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जिसने दुनिया से पीठ फेर ली, जिसने सबका त्याग कर दिया, जिसने वासना पर विजय पायी, जो शान्ति का प्यासा है, वही मुक्त है, वही महान् है। किसी को राजनीतिक और सामाजिक स्वतन्त्रता चाहे मिल जाये, पर यदि वह वासनाओं और इच्छाओं का दास है, तो सच्ची स्वतन्त्रता का शुद्ध आनन्द वह नहीं जान सकता।

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मैं सत्य के लिए हूं। सत्य मिथ्या के साथ कभी मैत्री नहीं कर सकता। चाहे सारी दुनिया मेरे विरुद्ध हो जाये, अन्त में सत्य ही जीतेगा।

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दाम्भिक गुरुवाद की चट्टान पर हर एक की नाव डूबती है, केवल वे आत्माएं ही बचती हैं, जो स्वयं गुरु बनने के लिए जन्म लेती हैं।

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यदि त्याग की शक्ति प्राप्त करनी हो, तो हमें संवेगात्मकता से ऊपर उठना होगा। संवेग पशुओं की कोटि की चीज है। वे पूर्णरूपेण संवेग के प्राणी होते हैं।

हर एक में परमात्मा है, बाकी सब तो सपना है, छलना है।

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एक सच्चा ईसाई सच्चा हिन्दू होता है और एक सच्चा हिन्दू सच्चा ईसाई।

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गुरु की कृपा से, शिष्य बिना ग्रन्थ पढ़े ही पण्डित हो जाता है।

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एक बार स्वामीजी किसी की बहुत प्रशंसा कर रहे थे, इस पर उनके पास बैठे हुए किसी ने कहा- “लेकिन वह आपको नहीं मानते”- इसे सुनकर स्वामीजी ने तत्काल उत्तर दिया- “क्या ऐसा कोई कानूनी शपथ-पत्र लिखा हुआ है कि उन्हें मेरी हर बात माननी ही चाहिए। वे अच्छा काम कर रहे हैं और इसलिए प्रशंसा के पात्र है।”

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न पाप है, न पुण्य है, सिर्फ अज्ञान है। अद्वैत की उपलब्धि से यह अज्ञान मिट जाता है।

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मैंने कभी प्रतिशोध की बात नहीं की। मैंने सदा बल की बात की है। हम समुद्र की फुहार की बूंद से बदला लेने की स्वप्न में भी कल्पना करते हैं? लेकिन एक मच्छर के लिए यह एक बड़ी बात है।

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दुनिया के सब धर्मग्रन्थों में केवल वेद ही यह घोषणा करते हैं कि वेदाध्ययन गौण है। सच्चा अध्ययन तो वह है, जिससे अक्षर ब्रह्म प्राप्त हो और वह न पढ़ना है, न विश्वास करना है, न तर्क करना है, वरन् अतिचेतन ज्ञान अथवा समाधि है।

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यदि एक अनन्त श्रृंखला में कुछ कड़ियां समझायी जा सकती हैं, तो उसी पद्धति से सब समझायी जा सकती हैं।

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एक पन्थ बनाते ही तुम विश्ववन्धुता के विरुद्ध हो जाते हो। जो सच्ची विश्वबन्धुता की भावना रखते हैं, वे अधिक बोलते नहीं, उनके कर्म ही स्वयं जोर-से बालते हैं।

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ईश्वर मनुष्य बना, मनुष्य भी फिर से ईश्वर बनेगा।

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जब तुम अपने आपको शरीर समझते हो, तुम विश्व से अलग हो; जब तुम अपने आपको जीव समझते हो, तब तुम अनन्त अग्नि के एक स्फुलिंग हो; जब तुम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो, तभी तुम विश्व हो।

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बाह्य प्रकृति अन्तःप्रकृति का ही विशाल आलेख है।

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अशुभ की जड़ इस भ्रम में है कि हम शरीर मात्र हैं। यदि कोई मौलिक या आदि पाप है, तो वह यही है।

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मनुष्य को सदैव अपनी कमियों एवं दुर्बलताओं को याद करते रहना चाहिए, उसकी दुर्बलताओं का प्रतिकार नहीं करना चाहिए। उसे अपने बल का स्मरण करा देना ही उसके प्रतिकार का उपाय है और उसमें जो अच्छाइयां एवं गुण हैं, उनका भी स्मरण कराते रहना चाहिए।

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दान के उचित-अनुचित होने का निर्णय दान करने वाले के अभिप्राय से नहीं, वरन् दान के फल से ही किया जाना चाहिए।

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यदि हम कुछ नहीं कर सकते, तो सच्चे तथा अकपटी बनने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि हम आदर्श का अनुगमन नहीं कर सकते, तो अपनी दुर्बलता स्वीकार कर लें, पर उसे हीन न बनाएं।

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यदि तुम सचमुच मेरी सन्तान हो, तो तुम किसी वस्तु से न डरोगे और किसी बात पर न रुकोगे। तुम सिंहतुल्य होगे। हमें भारत को आवश्यकता होने पर एवं अपने कार्य की सिद्धि के लिए आग में कूदने तक को भी तैयार रहना चाहिए।

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ये कभी न सोचना कि आत्मा के लिए कुछ असम्भव है। ऐसा कहना ही भयानक नास्तिकता है। यदि पाप नामक कोई वस्तु है, तो यह कहना ही एकमात्र पाप है कि मैं दुर्बल हूं अथवा अन्य कोई दुर्बल है।

 

ऐ बच्चो ! सबके लिए तुम्हारे दिल में दर्द हो-गरीब, मूर्ख, पददलित मनुष्यों के दुःख का तुम अनुभव करो, समवेदन से तुम्हारे हृदय का स्पन्दन रुक जाये, मस्तिष्क चकराने लगे। तुम्हें ऐसा प्रतीत हो कि हम पागल तो नहीं हो रहे हैं। तब ईश्वर के चरणों में अपना दिल खोल दो। तभी शक्ति, सहायता और अदम्य उत्साह तुम्हें मिल जायेगा।

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उसी प्रकार सहानुभूति और सहायता प्राप्त करने पर मनुष्य तो दूर रहा, पशु-पक्षी भी अपने बन सकते हैं।

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तुमको अन्दर से बाहर विकसित होना है। कोई तुमको न सिखा सकता है, न आध्यात्मिक बना सकता है। तुम्हारी आत्मा के सिवा और कोई गुरु नहीं है।

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यदि तुम मेरे ही समान भारत की माता हो, तो उन व्यक्तियों को त्याग दो, जो तुम्हारी प्रगति को रोकने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनकी ओर मुड़कर भी नहीं देखो ! आगे बढ़ो! आगे बढ़ो।

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बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मरण है। यह एक रहस्य है, बल ही अनन्त सुख है, चिरन्तन और शाश्वत जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु।

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संसार के प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि से भूल तो अवश्य ही होती है, किन्तु भूल को जीतने का प्रयत्न ही मनुष्य को महान् बना देता है।

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ज्ञानी मनुष्य केवल आत्मा के साक्षात्कार का ही प्रयत्न करता है, अन्य किसी भी प्रकार का नहीं।

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श्रृंखला की एक कड़ी पकड़ लो। धीरे-धीरे पूरी कड़ी की श्रृंखला हाथ आ जायेगी। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को पानी देने से पूरे वृक्ष को पानी मिल जाता है, उसके प्रत्येक तने, पत्ती आदि में पानी देने की आवश्यकता नहीं।

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महान् कार्य महान् त्याग से ही सम्पन्न हो सकते हैं।

दुःख का मुख्य कारण भय है। निर्भीकता के बल से मनुष्य पृथ्वी पर ही स्वर्ग के समान सुख भोग सकता है। यदि तुम निर्भयतापूर्वक कार्य करोगे, तो तुम्हें निश्चित ही सफलता प्राप्त होगी, लेकिन यदि तुम डर गये, तो तुम शक्तिहीन होकर दुःख के भागी बनोगे।

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ऊंचे स्थान पर खड़े हो, हाथ में दो पैसे लेकर यह न कहो, “ऐ भिखारी, यह ले,” वरन् कृतज्ञ होओ कि वह बेचारा गरीब वहां है, जिसे दान देकर तुम अपनी ही सहायता करने का अवसर पाते हो। सौभाग्य दान लेने वाले का नहीं, वरन् दान देने वाले का है।

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धनी और बड़े कहलाने वाले व्यक्तियों का मुंह ताकना छोड़ दो। सदैव स्मरण रहे कि विश्व का प्रत्येक बड़े-से-बड़ा कार्य छोटे आदमियों द्वारा ही सम्पन्न होता है, इसलिए उठो और अपने कार्य में जी-जान से जुट जाओ। निःसन्देह धनी संसार को तुम्हारी ओर झुकना पड़ेगा।

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दूसरों की मुक्ति के लिए तुम्हें नरक में भी जाना पड़े, तो सहर्ष जाओ। धरती पर ऐसी कोई मुक्ति नहीं, जिसे मैं अपना कह सकूं।

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दान से बड़ा धर्म और नहीं। सबसे नीच मनुष्य वह है, जिसके हाथ लेने के लिए फैल जाते हैं और सर्वोच्च व्यक्ति वह है, जिसके हाथ देने को बढ़ जाते हैं।

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ऊंची-से-ऊंची तथा नीची-से-नीची जाति के लोगों को भी ब्राह्मण के समान शुद्ध एवं ज्ञानी बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

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विनाश होने वाले सब भूतों में जो लोग अविनाशी परमात्मा की स्थिति देखते हैं, सार्थक में उन्हीं का देखना सार्थक है। क्योंकि ईश्वर को सर्वत्र समान भाव से देखकर वे आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करते, इसीलिए वे परमगति को प्राप्त होते हैं।

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स्वार्थपरता ही अनीति है और निःस्वार्थपरता नीति।

संसार के समस्त धर्मों तथा मानव जाति के जीवन का श्रद्धा एक प्रधान अंग है। सर्वप्रथम अपने आप पर विश्वास करने का प्रयत्न करो। यह निश्चित है कि कोई व्यक्ति छोटे-से जल-बुदबुद के बराबर हो सकता है और अन्य कोई पहाड़ों के समान विशाल। परन्तु इस छोटे जल-बुदबुद और भारी पहाड़ दोनों के पीछे ही अनन्त महान् समुद्र है।

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धर्म-ग्रन्थ जिन सद्‌गुणों को अपनाने की बात करते हैं, वे सभी अनायास उससे प्रवाहित होने लगते हैं, जो वेदान्त का आचरण करता है।

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वेदान्त परमात्मा के सर्वव्यापक होने से भी आगे की बात समझाता है। वेदान्त के अनुसार, यह समूची सृष्टि परमात्मा का ही विभिन्न रूपों में प्रकट होना है। तभी तो सच्चा वेदान्ती सृष्टि के जड़-चेतन से आत्मवत् प्रेम करता है।

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उठो, जागो और जब तक तुम अपने अन्तिम ध्येय तक नहीं पहुंच जाते, तब तक सक्रिय रहो और तब तक निश्चिन्त न हो।

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स्वाधीनता पाने का अधिकार उस व्यक्ति को नहीं है, जो दूसरों को स्वाधीनता देने के लिए तैयार नहीं है। मान लिया कि अंग्रेजों ने हमें क्षमता अर्पण कर दी, लेकिन उससे क्या लाभ ? कोई और देश अथवा जाति शक्तिशाली होकर हमसे वे सारी क्षमताएं छीन लेगी। गुलाम व्यक्ति तो शक्ति चाहता है, दूसरों को गुलाम बनाने के लिए शक्ति चाहिए।

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जहां कहीं विकास दिखाई देता है, इसका अर्थ है कि वहां वेदान्त के पवित्र सिद्धान्तों का आचरण किया जा रहा है। क्योंकि वेदान्त ही वह व्यावहारिक उच्चतम नियम हैं, जिनमें समस्त सम्पदाएं (भौतिक एवं आध्यात्मिक) निहित हैं।

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नीति में निपुण लोग चाहे प्रशंसा करें या निन्दा, लक्ष्मी चाहे आये अथवा इच्छानुसार चली जाये। मृत्यु अभी अथवा आज हो जाये या करोड़ों वर्षों में भी न हो। लेकिन धैर्यवान व्यक्ति कभी भी न्यायपथ से विचलित नहीं होता।

गति ही जीवन का मुख्य लक्षण है। अतः सदैव गतिमान रहकर अपने कार्यों में संलग्न रहो।

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उदार बनो, ध्यान रखो, जीवन का एकमात्र चिह्न है- गति और विकास।

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मैंने कभी बदला लेने की बात नहीं कही, मैंने सर्वदा बल की ही बात कही है। यह संसार तो समुद्र-फुहार की बूंद के समान क्षणभंगुर और क्षुद्र है। इस संसार में क्या हम आपस में बदला लेने की बात कर सकते हैं-कैसी ओछी बात ! मच्छर के लिए भले ही बड़ी बात हो।

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मेरा जीवन सत्य के लिए है। सत्य कभी भी मिथ्या के साथ मेल नहीं करेगा। यहां तक कि यदि सारी दुनिया भी मेरे विरोध में खड़ी हो जाये, तो भी अन्त में सत्य की ही विजय होगी।

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ईर्ष्या हमारी जाति का जन्मजात रोग है, हमें इसे आज समाप्त करना है और अपने आप पर विश्वास करना है; क्योंकि विश्वास मनुष्य को सिंह बना देता है।

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किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने से पहले सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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जिस मनुष्य का सभी से प्रेम है, जो ऊंच-नीच सभी को एक आंख से देखता है, गरीब-अमीर का अन्तर उसके हृदय में नहीं है, संसार उसके चरणों में झुक जाता है।

यह संसार कायरों के लिए नहीं है। भागने का प्रयत्न मत करो। सफलता या असफलता की परवाह मत करो।

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हम जानते हैं कि जब सूर्य हमारे सिर पर होता है, तब कोई छाया नहीं होती, फिर भला जब भगवान्, सत्य, भलाई एवं धर्मादि हममें ही विद्यमान हैं, तो अशुभ कहां ?

इस नश्वर जगत् में कीड़े की तरह भटकते हुए मरने से तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए तथा सत्य का उपदेश देते हुए मरना उचित है।

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 मनुष्य सारे प्राणियों से श्रेष्ठ है, सारे देवताओं से श्रेष्ठ है, उससे श्रेष्ठ और कोई नहीं। देवताओं को भी फिर से धरती पर नीचे आना पड़ेगा और मनुष्य शरीर धारण कर मुक्ति प्राप्त करनी होगी। केवल मनुष्य ही पूर्णता प्राप्त करता है, देवताओं तक के भाग्य में यह नहीं है।

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हे मेरे भारतीय वीरो ! घबराइए नहीं। प्रबल वायुवेग के झोंके वृक्षों से ही टकराते हैं। अग्नि को कुरेदने से वह अधिक तेज होती है, जब दिल दुखता है, अर्थात् हृदय में पीड़ा का अनुभव होता है, तब शोक रूपी आंधी हमें घेर लेती है और तब हमें आभास होता है कि अब अन्धकार-ही-अन्धकार चारों ओर फैला हुआ है और प्रकाश नाम की कोई वस्तु नहीं है, तब हमारी आशा तथा धैर्य का बांध टूट जाता है।

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अपने आदर्शों पर सदा प्रसन्नतापूर्वक डटे रहो और यह ध्यान रखो कि दूसरों को मार्ग दिखाने या हुकुम चलाने का प्रयत्न कभी न करो।

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मेरे देश का जब तक एक कुत्ता भी भूखा है, तब तक उसको भोजन खिलाना ही मेरा धर्म है।

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यदि मृत्यु होना अवश्य है, तो कीट-पतंगों की भांति मरने की अपेक्षा तो वीर की तरह मरना श्रेयस्कर है; क्योंकि इस नश्वर जगत् में एक-न-एक दिन तो मरना ही है। अतः जराजीर्ण होकर मरने की अपेक्षा सत्कार्य करते हुए मरना श्रेष्ठ है।

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परमात्मा एक असीम वृत्त है, उसकी परिधि भी नहीं है, लेकिन उसका केन्द्र सर्वत्र है।

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धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है। व्यर्थ के मतवादों से नहीं। भला बनना तथा भलाई करना इसमें ही समस्त धर्म निहित है।

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