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सूक्तियां एवं सुभाषित 

यदि तुम्हारा बुरा समय आता है, तो इससे क्या ? दोलक फिर पीछे जायेगा। पर यह कुछ अच्छा नहीं है। चाहिए तो यह कि इसे रोक दें।

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लोग कहते हैं कि मुझे भारत में सर्वसाधारण को वेदान्त की शिक्षा नहीं देनी चाहिए। किन्तु मैं कहता हूं कि मैं एक बच्चे को भी इसे समझा सकता हूँ। सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्यों की शिक्षा प्रारम्भ करने के लिए कोई भी वय कम नहीं है।

** संकल्प स्वतन्त्र नहीं होता, वह भी कार्य-कारण से बंधा एक तत्त्व है, लेकिन संकल्प के पीछे कुछ है, जो स्व-तन्त्र है।

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धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है।

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‘इहलोक’ और ‘परलोक’ यह बच्चों को डराने के शब्द हैं। सब कुछ ‘इह’ या यहां ही है। यहां, इसी शरीर में, ईश्वर में जीवित और गतिशील रहने के लिए सम्पूर्ण अहन्ता दूर होनी चाहिए, सारे अन्धविश्वासों को हटाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति भारत में रहते हैं। ऐसे लोग इस देश (अमेरिका) में कहां हैं? तुम्हारे प्रचारक स्वप्नदर्शियों के विरुद्ध बोलते हैं। इस देश के लोग और भी अच्छी दशा में होते, यदि कुछ अधिक स्वप्नदर्शी होते। स्वप्न देखने और उन्नीसवीं सदी की बकवास में बहुत अन्तर है। यह सारा जगत् ईश्वर से भरा है, पाप से नहीं। आओ, हम एक-दूसरे की मदद करें, एक-दूसरे से प्रेम करें।

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हो सकता है कि एक पुराने वस्त्र को त्याग देने के सदृश, अपने शरीर से बाहर निकल जाने को मैं बहुत उपादेय पाऊं। लेकिन में काम करना नहीं छोडूंगा। जब तक सारी दुनिया न जान ले, मैं सब जगह लोगों को यही प्रेरणा देता रहूंगा कि वह परमात्मा के साथ एक है।

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वस्तुएं अधिक अच्छी नहीं बनीं, हम उनमें परिवर्तन करके अधिक अच्छा बनाते हैं।

 

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संगपरित्यागी, विरक्त और वानप्रस्थों के लिए ही हों और यदि वे दैनन्दिन जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में आशा का दीपक नहीं जला सकते, यदि वे उनके दैनिक श्रम, रोग, दुःख, दैन्य, परिताप में निराशा, दलितों की आत्मग्लानि, युद्ध के भय, लोभ, क्रोध, इन्द्रिय सुख, विजयानन्द, पराजय के अन्धकार और अन्ततः मृत्यु की भयावनी रात में काम में नहीं आते, तो दुर्बल मानवता को ऐसे शास्त्रों की ज़रूरत नहीं और ऐसे शास्त्र शास्त्र नहीं हैं।

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परोपकार ही धर्म है, परपीड़न ही पाप। शक्ति और पौरुष पुण्य है, कमज़ोरी और कायरता पाप। स्वतन्त्रता पुण्य है, पराधीनता पाप। दूसरों से प्रेम करना पुण्य है, दूसरों से घृणा करना पाप। परमात्मा में और अपने आप में विश्वास पुण्य है, सन्देह ही पाप है। एकता का ध्यान पुण्य है, अनेकता देखना ही पाप। विभिन्न शास्त्र केवल पुण्य-प्राप्ति के ही साधन बताते हैं।

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सुख आदमी के सामने आता है, तो दुःख का मुकुट पहनकर। जो उसका स्वागत करता है, उसे दुःख का भी स्वागत करना चाहिए।

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मैं अपने साथियों की मदद कर सकूं, बस इतना ही मैं चाहता हूं।

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ओह, यदि तुम अपने आपको जान पाते ! तुम आत्मा हो, तुम ईश्वर हो। यदि मैं कभी ईश-निन्दा करता-सा अनुभव करता हूं, तो तब, जब मैं तुम्हें मनुष्य कहता हूं।

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गीता का पहला संवाद रूपक माना जा सकता है।

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वत्स ! मैं चाहता हूं कि लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु, जिनके अन्दर ऐसे मन का वास हो, जो वज्र के उत्पादनों से गठित हो।

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हम काफी रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं। अब अपने पैरों पर खड़े होओ और ‘मनुष्य’ बनो। हम ‘मनुष्य’ बनाने वाला धर्म ही चाहते हैं। हम ‘मनुष्य’ बनाने वाले सिद्धान्त ही चाहते हैं। हम सर्वत्र, सभी क्षेत्रों में, ‘मनुष्य’ बनाने वाली शिक्षा ही चाहते हैं और यह रही सत्य की कसौटी – जो कुछ तुम्हें शरीर से, बुद्धि से या आत्मा से कमजोर बनाये, उसे संगपरित्यागी, विरक्त और वानप्रस्थों के लिए ही हों और यदि वे दैनन्दिन जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में आशा का दीपक नहीं जला सकते, यदि वे उनके दैनिक श्रम, रोग, दुःख, दैन्य, परिताप में निराशा, दलितों की आत्मग्लानि, युद्ध के भय, लोभ, क्रोध, इन्द्रिय सुख, विजयानन्द, पराजय के अन्धकार और अन्ततः मृत्यु की भयावनी रात में काम में नहीं आते, तो दुर्बल मानवता को ऐसे शास्त्रों की ज़रूरत नहीं और ऐसे शास्त्र शास्त्र नहीं हैं।


परोपकार ही धर्म है, परपीड़न ही पाप। शक्ति और पौरुष पुण्य है, कमज़ोरी और कायरता पाप। स्वतन्त्रता पुण्य है, पराधीनता पाप। दूसरों से प्रेम करना पुण्य है, दूसरों से घृणा करना पाप। परमात्मा में और अपने आप में विश्वास पुण्य है, सन्देह ही पाप है। एकता का ध्यान पुण्य है, अनेकता देखना ही पाप। विभिन्न शास्त्र केवल पुण्य-प्राप्ति के ही साधन बताते हैं।

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सुख आदमी के सामने आता है, तो दुःख का मुकुट पहनकर। जो उसका स्वागत करता है, उसे दुःख का भी स्वागत करना चाहिए।

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मैं अपने साथियों की मदद कर सकूं, बस इतना ही मैं चाहता हूं।

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ओह, यदि तुम अपने आपको जान पाते ! तुम आत्मा हो, तुम ईश्वर हो। यदि मैं कभी ईश-निन्दा करता-सा अनुभव करता हूं, तो तब, जब मैं तुम्हें मनुष्य कहता हूं।

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गीता का पहला संवाद रूपक माना जा सकता है।

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वत्स ! मैं चाहता हूं कि लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु, जिनके अन्दर ऐसे मन का वास हो, जो वज्र के उत्पादनों से गठित हो।

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हम काफी रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं। अब अपने पैरों पर खड़े होओ और ‘मनुष्य’ बनो। हम ‘मनुष्य’ बनाने वाला धर्म ही चाहते हैं। हम ‘मनुष्य’ बनाने वाले सिद्धान्त ही चाहते हैं। हम सर्वत्र, सभी क्षेत्रों में, ‘मनुष्य’ बनाने वाली शिक्षा ही चाहते हैं और यह रही सत्य की कसौटी – जो कुछ तुम्हें शरीर से, बुद्धि से या आत्मा से कमजोर बनाये, उसे

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: यशस्वी मनीषी स्वामी विवेकानन्द

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