सूक्तियां एवं सुभाषित | Swami vivakanand

सूक्तियां एवं सुभाषित | Swami vivakanand part-0

वेदान्त का तात्पर्य है उस ज्ञान से, जिसके बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता। कारण को जानने के बाद कार्य का ज्ञान स्वतः हो जाता है।

★★ सार बात है- त्याग ! त्याग के बिना कोई भी पूरे हृदय से दूसरों के लिए कार्य नहीं कर सकता। त्यागी पुरुष सबको समदृष्टि से देखता है-तब फिर तुम अपने मन में यह भावना क्यों पोसते हो कि पत्नी-पुत्र दूसरों की अपेक्षा तुम्हारे अधिक अपने हैं? तुम्हारे दरवाजे पर साक्षात् नारायण एक दीन भिखारी के रूप में भूखों मर रहा है। उसको कुछ न देकर क्या तुम केवल अपनी पत्नी और बच्चों की चोटारी रसना की तृप्ति में ही लगे रहोगे ? क्यों, यह तो पाशविक है।

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आज हमाारी जातियां परस्पर एक-दूसरे से नफरत कर रही हैं, एक-दूसरे पर अत्याचार ढा रही हैं, यही कारण है कि करोड़ों इंसान भारत की धरती पर केंचुए की तरह रेंग रहे हैं।

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चांदी के चमकते रुपये और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को कैसे खो रहे हैं। महामाया का कैसा आश्चर्यजनक प्रभाव है। माता महामाया रक्षा करो !

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मैं कहता हूं, जितनी शक्ति है, पहले उतना ही कार्य करो। धन के अभाव में यदि कुछ नहीं दे सकता, तो न सही, पर एक मीठी बात या एक-दो सदुपदेश तो उन्हें दे सकता है, क्या इसमें भी धन की आवश्यकता है?

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वीर लोग ही वसुन्धरा का भोग करते हैं, यह वचन नितान्त सत्य है। वीर बनो, सर्वदा कहो मैं भयशून्य हूं, मैं भयशून्य हूं। सबको उपदेश दो- भय न करो, भय न करो। भय ही मृत्यु है, भय ही पाप है। भय ही नरक तथा भय ही अधर्म है।

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ढोल-करताल बजाकर और उछल-कूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है। एक तो यह पेट रोग के मरीजों का दल है-और उस पर इतनी उछल-कूद भला कैसे सहन हो सकेगी ?

किसी भी वस्तु की कामना की पूर्ति उसमें कामना की वृद्धि ही करती है। जिस प्रकार अग्नि में डाला गया घी उसे और भी अधिक प्रचण्ड करता है।

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परमेश्वर की दया से मनुष्य की मुक्ति का मार्ग लभ्य है, कार्य कारण का नियम एक बार शुरू होने पर कभी भी उसको तोड़ा नहीं जाना चाहिए। परमेश्वर ही अपनी दया से इसे तोड़ सकता है।

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हम हमेशा अपनी कमजोरी को शक्ति बताने की कोशिश करते हैं, अपनी भावुकता को प्रेम कहते हैं, अपनी कायरता को धैर्य, इत्यादि।

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मनुष्यों में साधारणतया चार प्रकार होते हैं- बुद्धिवादी, भावुक, रहस्यवादी, कर्मठ। हमें इनमें से प्रत्येक के लिए उचित प्रकार की पूजा-विधि देनी चाहिए। बुद्धिवादी मनुष्य आता है और कहता है: ‘मुझे इस तरह का पूजा- विधान पसन्द नहीं। मुझे दार्शनिक, विवेकसिद्ध सामग्री दो, वही मैं चाहता हूं।’ अतः बुद्धिवादी मनुष्य के लिए बुद्धिसम्मत दार्शनिक पूजा है।

फिर आता है कर्मठ। वह कहता है : ‘दार्शनिक की पूजा मेरे किसी काम की नहीं। मुझे अपने मानव बन्धुओं की सेवा का काम दो।’ उसके लिए सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। रहस्यवादी और भावुक के लिए उनके योग्य पूजा- पद्धतियां हैं। धर्म में इन सब लोगों के विश्वास के तत्त्व हैं।

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जब तक तुम स्वयं अपने में विश्वास नहीं करते, परमात्मा में तुम विश्वास नहीं कर सकते।

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ईश्वर की परिभाषा करना चर्वितचर्वण है; क्योंकि एकमात्र परम अस्तित्व, जिसे हम जानते हैं, वही है।

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यदि इस जीवन में मोक्ष नहीं मिल सकता, तो क्या आधार है कि तुम्हें वह अगले एक या अनेक जन्मों में मिलेगा ही ?

जितना कम पढ़ो उतना ही अच्छा है। गीता तथा वेदान्त पर अन्य अच्छी पुस्तकों को पढ़ो। बस इसीकी तुम्हें आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूर्णतः दोषपूर्ण है। चिन्तन शक्ति का विकास होने के ही पूर्व मस्तिष्क

बहुत-सी बातों से भर दिया जाता है। मन के संयम की शिक्षा पहले दी जानी चाहिए। यदि मुझे अपनी शिक्षा फिर प्रारम्भ करनी हो और कुछ भी मेरी चले, तो मैं सर्वप्रथम अपने मन का स्वामी बनना सीखूंगा और तब यदि मुझे आवश्यता होगी, तो तथ्यों का संग्रह करूंगा। लोगों को सीखने में बहुत देर लगती है; क्योंकि वे अपने मन को इच्छानुसार एकाग्र नहीं कर पाते।

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 पश्चिम विवाह को विधिमूलक गठबन्धन के बाहर जो कुछ है, उन सबसे युक्त मानता है, जबकि भारत में इसे समाज द्वारा दो व्यक्तियों को शाश्वत काल तक संयुक्त रखने के लिए उनके ऊपर डाला हुआ बन्धन माना जाता है। उन दोनों को एक-दूसरे को जन्म-जन्मान्तर के लिए वरण करना होगा, चाहे उनकी इच्छा हो या न हो। प्रत्येक एक-दूसरे के आधे पुण्य का भागी होता है। यदि एक इस जीवन में बुरी तरह पिछड़ जाता है, तो दूसरे को, जब तक कि वह फिर बराबर नहीं आ जाता, केवल प्रतीक्षा करनी पड़ती है, समय देना होता है।

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 हमें इसकी क्या चिन्ता कि मुहम्मद अच्छे थे या बुद्ध ? क्या इससे मेरी अच्छाई या बुराई में परिवर्तन हो सकता है? आओ, हम लोग अपने लिए और अपनी जिम्मेदारी पर अच्छे बनें।

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शंकराचार्य ने वेदों की लय को, राष्ट्रीय आरोह-अवरोह को पहचाना था। सचमुच मैं सदैव यह कल्पना किया करता हूं कि बाल्यकाल में उन्हें भी मेरी भांति कोई-न-कोई दिव्यानुभूति अवश्य हुई होगी, और तब उन्होंने उस पुरातन संगीत का पुनरुद्धार किया। कुछ भी हो, उनके समस्त जीवन का कार्य, वेदों और उपनिषदों की सुषमा के स्पन्दन के सिवा और कुछ नहीं।

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जब स्वामी विवेकानन्द के एक शिष्य ने उनसे लौकिक व्यवहारशीलता की कोई बात कही, तब वे झल्लाकर कहने लगे, “योजनाएं। योजनाएं। यही कारण है कि… पश्चिम के लोग कभी धर्म की सुष्टि नहीं कर सकते। यदि तुम लोगों में से किसी ने की, तो केवल उन घोड़े से कैथोलिक सन्तों ने, जिनके पास कोई योजनाएं नहीं थीं। योजना बनाने वालों ने कभी धर्म की शिक्षा नहीं दी।

स्वामीजी से किसी ने पूछा- “क्या बुद्ध ने उपदेश दिया था कि नानात्व सत्य है और अहम् असत्य है, जबकि सनातनी हिन्दू धर्म एक को सत्य और अनेक (या नानात्व) को असत्य मानता है?” स्वामीजी ने उत्तर दिया- “हां, और रामकृष्ण परमहंस तथा मैंने इसमें जो कुछ जोड़ा है, वह यह है- अनेक और एक, एक ही तत्त्व हैं, जिसका प्रत्यक्ष मन विभिन्न समयों पर और विभिन्न वृत्तियों के साथ करता है।”

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एक शिष्या के कथन का उत्तर देते हुए, जिसके विचार में मोक्ष की उत्कट अभिलाषा लेकर व्यक्तिगत मुक्ति के लिए प्रयत्न करने की अपेक्षा अपने प्रिय आदर्शों की पूर्ति के लिए बार-बार जन्म लेना उसके लिए अधिक श्रेयस्कर होगा, स्वामीजी ने तत्काल उत्तर दिया- “इसका कारण यह है कि तुम प्रगति के विचार के ऊपर विजय नहीं प्राप्त कर पार्टी। किन्तु चीजों की अच्छाई में वृद्धि नहीं होती। वे तो जैसी की तैसी रहती हैं, और हम उनमें जो परिवर्तन करते हैं, उसके अनुसार ‘हम’ श्रेष्ठतर होते चलते हैं।”

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रामकृष्ण परमहंस ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जो सदैव यह कहने का साहस रखते थे कि हमें सभी लोगों को उनकी ही भाषा में उत्तर देना चाहिए।

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यूरोप वालों द्वारा नरभक्षी वृत्ति के इस तरह उल्लेख को कि जैसे वह कुछ समाजों के जीवन का सामान्य अंग ही हो, लक्षित करते हुए स्वामीजी ने कहा- “यह सत्य नहीं है। किसी भी जाति ने धार्मिक बलिदान, युद्ध अथवा प्रतिशोध के अतिरिक्त कभी भी नर-मांस भक्षण नहीं किया। क्या तुम नहीं देखते ? वह यूथचारी प्राणियों में हो ही नहीं सकती। वह तो सामाजिक जीवन का ही मूलोच्छेदन कर देगी।

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स्वामीजी मानते थे कि पुराण उदात्त भावों को जनता तक पहुंचाने के निमित्त हिन्दू धर्म का प्रयास है। भारत में केवल एक ही व्यक्ति, कृष्ण की बुद्धि ऐसी थी, जिसने इस आवश्यकता को पहले ही समझा था। सम्भवतः वे मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ थे।

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सच्चे धर्म के क्षेत्र में, कोरे पुस्तकीय ज्ञान का कोई स्थान नहीं।

स्थापत्य के बारे में उन्होंने कहा- “लोग कहते हैं, कलकत्ता महलों का नगर है, परन्तु यहां के मकान ऐसे लगते हैं, जैसे एक सन्दूक के ऊपर दूसरा रखा गया हो। इनसे कोई कल्पना नहीं जागती। राजपूताना में अभी भी बहुत कुछ मिल सकता है, जो शुद्ध हिन्दू स्थापत्य है। यदि एक धर्मशाला को देखो, तो लगेगा कि वह खुली बांहों से तुम्हें अपनी शरण में लेने के लिए पुकार रही है और कह रही है कि मेरे निर्विशेष आतिथ्य का अंश ग्रहण करो। किसी मन्दिर को देखो, तो उसमें और उसके आसपास दैवी वातावरण निश्चय मिलेगा। किसी देहाती कुटी को भी देखो, तो उसके विविध हिस्सों का विशेष अर्थ तुम्हारी समझ में आ सकेगा, और उसके स्वामी के आदर्श और प्रमुख स्वभाव-गुणों का साक्ष्य उस पूरी बनावट से मिलेगा। इटली को छोड़कर मैंने कहीं भी ऐसा अभिव्यंजक स्थापत्य नहीं देखा।”

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दुःखभोग का एकमात्र कारण है दुर्बलता। हम दुखी हो जाते हैं; क्योंकि

हम दुर्बल हैं। हम झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, हत्या करते हैं, तरह-तरह के

अपराध करते हैं, क्यों, इसलिए कि हम दुर्बल हैं। हम दुःख भोगते हैं; क्योंकि हम दुर्बल हैं। हम मर जाते हैं; क्योंकि हम दुर्बल हैं। जहां हमें दुर्बल कर देने वाली कोई चीज नहीं है, वहां न मृत्यु है, न दुःख। **

त्याग और परसेवा ही भारतवर्ष के राष्ट्रीय आदर्श हैं। इन बातों को करने से ही भारतवर्ष उन्नति की चोटी छू सकता है। केवल इन दो आदर्शों का पालन करने से ही भारतवर्ष विश्व के सभी देशों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर सकता है।

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प्रेम ही ज्ञान देता है और प्रेमी ही मुक्ति की ओर ले जाता है। यह निश्चय ही उपासना है, क्षणभंगुर मानवी शरीर में यही ईश्वर की उपासना है।

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धर्म ही भारत का मुख्य आधार है, जिस प्रकार अन्य देशों में राजनीति अथवा समाजनीति ।

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हमें उस स्थान पर पहुंचना है, जहां न वेद है, न बाइबिल है, न कुरान है। परन्तु वेद, बाइबिल और कुरान सबका समन्वय है।

 

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