सूक्तियां एवं सुभाषित | Swami vivakanand

1. जिस बात की दुनिया को आज आवश्यकता है, वह है बीस ऐसे स्त्री-पुरुष, जो सड़क पर खड़े होकर सबके सामने यह कहने का साहस कर सकें कि हमारे पास ईश्वर को छोड़कर और कुछ नहीं है। कौन निकलेगा? डर की क्या बात है? यदि यह सत्य है, तो और किसी बात की क्या परवाह ? यदि यह सत्य नहीं है, तो हमारे जीवन का ही क्या मूल्य है?

 

 

2. जैसे देश में जड़ वस्तु के कण संयुक्त होते हैं, वैसे ही काल में मन की तरंगें संयुक्त होती हैं।

सब प्राणियों के प्रति करूणा रखो। जो दुःख में हैं, उन पर दया करो। सब प्राणियों से प्रेम करो। किसी से ईर्ष्या मत करो। दूसरों के दोष मत देखो।

व्यक्तिगत रूप से मैं वेदों में से उतना ही स्वीकार करता हूं, जो बुद्धिसम्मत है। वेदों के कतिपय अंश स्पष्ट ही परस्पर विरोधी हैं। वे पाश्चात्य अर्थ में, दैवी प्रेरणा से प्रेरित नहीं माने जाते हैं। परन्तु वे ईश्वर के ज्ञान या सर्वज्ञता का सम्पूर्ण रूप हैं। यह ज्ञान एक कल्प के आरम्भ में व्यक्त होता है और जब वह कल्प समाप्त होता है, वह सूक्ष्म रूप प्राप्त करता है। जब कल्प पुनः व्यक्त होता है, ज्ञान भी व्यक्त होता है। यहां तक यह सिद्धान्त ठीक है। पर यह कहना कि केवल यह वेद नामक ग्रन्थ ही उस परम तत्त्व का ज्ञान है, कुतर्क है। मनु ने एक स्थान पर कहा है कि वेद में वही अंश वेद है, जो बुद्धिग्राह्य, विवेकसम्मत है। हमारे अनेक दार्शनिकों ने यही दृष्टिकोण अपनाया है।

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3. मानसिक जगत् का पर्यवेक्षक बहुत बलवान और वैज्ञानिक प्रशिक्षणयुक्त होना चाहिए। 

यह एक बच्चों की-सी बात है कि मनुष्य मरता है और स्वर्ग में जाता है। हम कभी न आते हैं, न जाते हैं। हम जहां हैं, वहीं रहते हैं। सागरी आल्यात जो हो चुकी हैं, अब हैं और आगे होंगी, वे सब ज्यामिति के एक बिन्दु पर स्थित हैं।

जब भारत का सच्चा इतिहास लिखा जायेगा, यह सिद्ध होगा कि धर्म के विषय में और ललितकलाओं में भारत सारे विश्व का प्रथम गुरु है।

4. जब कोई प्रतिभा या विशेष शक्ति वाला व्यक्ति जन्म लेता है, तो मानो उसके आनुवंशिक सर्वोत्तम गुण और सबसे क्रियाशील विशेषताएं उसके व्यक्तित्व के निर्माण में पूरी तरह निचुड़कर, स्तररूप में आती है। इसी कारण हम देखते हैं कि उसी वंश में बाद में जन्म लेने वाले या तो मूर्ख होते हैं या साधारण योग्यता वाले, और कई उदाहरण ऐसे भी हैं कि कभी-कभी ऐसे वंश पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।

 

5. जब स्वामीजी रामनाड़ में थे, एक संभाषण के बीच उन्होंने कहा कि श्रीराम परमात्मा हैं। सीता जीवात्मा और प्रत्येक स्त्री या पुरुष का शरीर लंका है। जीवात्मा जो कि शरीर में बद्ध है या लंकाद्वीप में बन्दी है, वह सदा परमात्मा श्रीराम से मिलना चाहती है। लेकिन राक्षस यह होने नहीं देते। और ये राक्षय-चरित्र के कुछ गुण हैं। जैसे विभीषण सत्त्व गुण है, रावण रजोगुण, कुम्भकर्ण तमोगुण। सत्त्व गुण का अर्थ है अच्छाई, रजोगुण का अर्थ है लोभ और वासना, तमोगुण में अन्धकार, आलस्य, तृष्णा, ईर्ष्या आदि विकार आते हैं। ये गुण शरीररूपी लंका में बन्दिनी सीता को, यानी जीवात्मा को परमात्मा श्रीराम से मिलने नहीं देते। सीता जब बन्दिनी होती हैं और अपने स्वामी से मिलने के लिए आतुर रहती हैं, उन्हें हनुमान या गुरु मिलते हैं, जो ब्रह्मज्ञानरूपी मुद्रिका उन्हें दिखाते हैं और उसको पाते ही सब भ्रम नष्ट हो जाते हैं और इस प्रकार से सीता श्रीराम से मिलने का मार्ग पा जाती हैं, या दूसरे शब्दों में जीवात्मा परमात्मा में एकाकार हो जाती है।

6. पैसे वालों की पूजा का प्रवेश होते ही धार्मिक सम्प्रदाय का पतन आरम्भ हो जाता है।

ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म-ये चार मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाले है। हर एक को उस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिसके लिए वह योग्य है, लेकिन इस युग में कर्मयोग पर विशेष बल देना चाहिए।

 

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 7. मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए उत्पन्न हुआ है, उसका अनुसरण करने के लिए नहीं।

 तुम्हारी प्रवृत्ति तुम्हारे काम का मापदण्ड है। तुम ईश्वर हो और निम्नतम मनुष्य भी ईश्वर है, इससे बढ़कर और कौन-सी प्रवृत्ति हो सकती है।

यह सोचना भूल है कि सभी मनुष्यों के लिए सुख ही प्रेरणा होता है। उतनी ही बड़ी संख्या तो उनकी भी है, जो दुःख की खोज करने के लिए ही जन्म लेते हैं। आओ, हम लोग भी ‘कराल’ की उपासना ‘कराल’ के ही निमित्त करें।

मुझे विश्वास हो चला है कि नेता का निर्माण एक जीवन में नहीं होता। उसे इसके लिए जन्म लेना होता है। कारण यह है कि संगठन और योजनाएं बनाने में कठिनाई नहीं होती, नेता की परीक्षा, वास्तविक परीक्षा विभिन्न प्रकार के लोगों को उनकी सर्वसामान्य समवेदनाओं की दिशा में एकत्र रखने में है। यह केवल अनजाने में ही किया जाना सम्भव है, प्रयत्न द्वारा कदापि नहीं।

दो विभिन्न जातियों का सम्पर्क होने पर वे घुलमिल जाती हैं और उनसे एक बलशाली तथा भिन्न नस्ल पैदा होती है। वह स्वयं अपने को सम्मिश्रण से बचाने की चेष्टा करती है और यहीं तुम जाति-भेद का प्रारम्भ देखते हो। सेब को देखो। चयनात्मक प्रजनन द्वारा श्रेष्ठतम प्रकार उत्पन्न किये जाते हैं, पर एक बार दो नस्लें बनाकर हम उनकी किस्म को सुरक्षित रखने की चेष्टा करते हैं।

9. यदि तुम्हारा बुरा समय आता है, तो इससे क्या ? दोलक फिर पीछे जायेगा। पर यह कुछ अच्छा नहीं है। चाहिए तो यह कि इसे रोक दें।

लोग कहते हैं कि मुझे भारत में सर्वसाधारण को वेदान्त की शिक्षा नहीं देनी चाहिए। किन्तु मैं कहता हूं कि मैं एक बच्चे को भी इसे समझा सकता हूँ। सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्यों की शिक्षा प्रारम्भ करने के लिए कोई भी वय कम नहीं है।

 संकल्प स्वतन्त्र नहीं होता, वह भी कार्य-कारण से बंधा एक तत्त्व है, लेकिन संकल्प के पीछे कुछ है, जो स्व-तन्त्र है।

10. ‘इहलोक’ और ‘परलोक’ यह बच्चों को डराने के शब्द हैं। सब कुछ ‘इह’ या यहां ही है। यहां, इसी शरीर में, ईश्वर में जीवित और गतिशील रहने के लिए सम्पूर्ण अहन्ता दूर होनी चाहिए, सारे अन्धविश्वासों को हटाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति भारत में रहते हैं। ऐसे लोग इस देश (अमेरिका) में कहां हैं? तुम्हारे प्रचारक स्वप्नदर्शियों के विरुद्ध बोलते हैं। इस देश के लोग और भी अच्छी दशा में होते, यदि कुछ अधिक स्वप्नदर्शी होते। स्वप्न देखने और उन्नीसवीं सदी की बकवास में बहुत अन्तर है। यह सारा जगत् ईश्वर से भरा है, पाप से नहीं। आओ, हम एक-दूसरे की मदद करें, एक-दूसरे से प्रेम करें।

हो सकता है कि एक पुराने वस्त्र को त्याग देने के सदृश, अपने शरीर से बाहर निकल जाने को मैं बहुत उपादेय पाऊं। लेकिन में काम करना नहीं छोडूंगा। जब तक सारी दुनिया न जान ले, मैं सब जगह लोगों को यही प्रेरणा देता रहूंगा कि वह परमात्मा के साथ एक है।

11. वस्तुएं अधिक अच्छी नहीं बनीं, हम उनमें परिवर्तन करके अधिक अच्छा बनाते हैं। यदि तुम्हारा बुरा समय आता है, तो इससे क्या ? दोलक फिर पीछे जायेगा। पर यह कुछ अच्छा नहीं है। चाहिए तो यह कि इसे रोक दें।

लोग कहते हैं कि मुझे भारत में सर्वसाधारण को वेदान्त की शिक्षा नहीं देनी चाहिए। किन्तु मैं कहता हूं कि मैं एक बच्चे को भी इसे समझा सकता हूँ। सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्यों की शिक्षा प्रारम्भ करने के लिए कोई भी वय कम नहीं है।

 

12. संकल्प स्वतन्त्र नहीं होता, वह भी कार्य-कारण से बंधा एक तत्त्व है, लेकिन संकल्प के पीछे कुछ है, जो स्व-तन्त्र है।

धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है।

 

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