स्वामी विवेकानंद की 5 कहानी आपको बहुत कुछ सिखा देगी

 1. कपड़े के जूते

स्वाभीजी के अमेरिका पहिला बात है। एक दिन में एक बगीचे में रहल रहे थे। तभी एक सोती हुई बार की नज़र उन पर पड़ी। उसने ची को गौर से देखा और इठलाती हुई बोली- आप अन्यथा प से, तो मैं जारी एक प्रश्न

स्वामीजी भोले- “हां-हां, जरूर प्रश्न पूछिये। “उसने पूछा-“स्वामीजी। आपका सारा परिधान तो भारतीय है, पर आपके कपड़े के जूते तो भारतीय नहीं हैं, फिर आपने ये क्यों पहन रखे हैं?”

स्वामीजी सहजता से बोले-“ये जूते जिनकी देन हैं, मैं उन्हें यहाँ तक रखना चाहता हूं। मैं इसीलिए इन्हें पहनता हूं।”

महिला शर्म से खड़ी हो गयी। कहां तो चली थी स्वामीजी को भारतीयता का पाठ पढ़ाने, पर उसे अब अपनी ” श्रेष्ठ” जाति की महत्ता का पता चल गया था।

2. रोटी और धर्म

पिछली सदी के विख्यात लेखक और पत्रकार श्री सखाराम गदेइस्कर एक बार अपने दो मित्रों के साथ स्वामी विवेकानन्दजी से मिलने गये। बातचीत के दौरान स्वामीजी को पता चला कि उनमें से एक सज्जन पंजाब के निवासी हैं। उन दिनों पंजाब में अकाल पड़ा हुआ था। स्वामीजी ने अकाल-पीड़ितों के बारे में चिन्ता प्रकट की और पीड़ितों के लिए क्या-क्या राहत कार्य किये जा रहे हैं, उनके बारे में पूछताछ की। तदन्तर वे शिक्षा तथा नैतिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए विनयपूर्वक बोले-“महाराज! मैं तो आपके पास आशा से आया था कि धर्म के विषय में उत्कृष्ट उपदेश सुनने को मिलेगा, परन्तु आप तो सामान्य विषयों की ही चर्चा करते रहे और आपके पास से कुछ भी ज्ञान नहीं मिला।”

स्वामीजी क्षण-भर चुप रहे, फिर बड़े गम्भीर स्वर में बोले-“भाई! जब तक मेरे देश में एक भी छोटा बच्चा भूखा है, तब तक उसे खिलाना, उसे संभालना, यही सच्चा धर्म है। इसके सिवा जो कुछ है, वह झूठा धर्म है। जिनका पेट खाली हो, उनके सामने धर्म का उपदेश करना निरा दम्भ है। पहले उन्हें रोटी का टुकड़ा देने का प्रयत्न करना चाहिए।

3. सभी के लिए समभाव

स्वाभीजी खेतड़ी से जयपुर आये थे। खेतड़ी के महाराज उन्हें विदा करने के लिए जयपुर तक साथ आये थे। एक दिन संध्याबेला में महाराज ने एक पर्तकों को अपने यहां बुलाया। इस नृत्य-गायन के आयोजन में सम्मिलित होने के लिए उन्होंने स्वामीजी को भी कहा, परन्तु उन्होंने यह कहकर सम्मिलित होना अस्वीकार कर दिया कि नर्तकी के नृत्य-गायन में संन्यासी का उपस्थित रहना अनुचित है। जब नर्तकी को इसका पता लगा, तो दुःख से उसका हृदय कराह उठा। वह सोचने लगी कि क्या वह इतनी घृणित है कि गुरुजी उसकी उपस्थिति में कमरे में भी नहीं बैठ सकते। उसका नारी-सुलभ अभिमान जाग उहा। उसने वेदना-भरे स्वर में भक्त सूरदास का भक्ति-गीत गया-

‘प्रभु भोरे अवगुण चित न धरो।

समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो…’

भजन के बोल साथ लगे कमरे में बैठे संन्यासी के कानों में पड़े। उस काच्यांगना के सधे स्वर और गाया हुआ सूरदास का यह भजन स्वामी विवेकानन्द की समझ में आ गया। गणिका की वेदना से स्वामीजी व्याकुल हो उठे। बाद में स्वामीजी ने उस गणिका से क्षमायाचना की थी।

एक बार किन्हीं महाशय ने दक्षिणेश्वर के महोत्सव में वेश्याओं के जाने पर आपत्ति की थी, तब विवेकानन्दजी ने स्पष्ट उत्तर दिया-“वेश्याएं यदि दक्षिणेश्वर के तीर्थ में न जा सकें, तो कहां जायेंगी? पतितों के लिए प्रभु विशेष अनुग्रहवान हैं। पुण्यात्माओं के लिए उतने नहीं।

“जो लोग देवालय में जाकर भी ‘यह वेश्या है, यह नीच जाति है, यह निर्धन है और यह छोटा आदमी है’ इस प्रकार सोचते हैं, उनकी संख्या जितनी कम हो जाये, समाज का उतना ही कल्याण होगा। जो लोग शरणागत की जाति, लिंग और अवस्था-व्यवसाय देखते हैं, वे भी श्रीरामकृष्ण देव को क्या समझेंगे? मैं तो प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि शत-शत वेश्याएं आयें उनके चरणों पर शीश झुकाने के लिए, अपितु एक भी भद्र पुरुष न आये, तो न आये, वेश्याएं आयें, शराबी आयें, चोर-डाकू आयें, उनका द्वारा खुला है।”

4. दुर्भिक्ष

पूर्वी बंगाल के कुछ जिलों में दुर्भिक्ष पड़ा था। स्वामी विवेकानन्द पांड़ितों के लिए अन्न-धन एकत्र कर रहे थे। जब वे ढाका में थे, तब उनसे कुछ वेदांती पण्डित शास्त्रार्थ करने आये। स्वामी जी ने उन्हें आदर से बैग्रया और अकाल की चर्चा करते हुए कहा – “जब मैं अकाल से लोगों की मरते हुए सुनता हूं, तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। क्या इच्छा है प्रभु की। “यह सुनकर सभी पण्डित मौन रहे और एक-दूसरे से नजर मिला मन्द-मद मुसकराने लगे। उनकी इस विचित्र प्रतिक्रिया को देखकर स्वामीजी स्तब्ध र गये। कुछ देर मौन के पश्चात् ये पूछ उठे-” आप लोग मुझ पर हंस गई है?” एक पण्डित ने और अधिक मुसकराते हुए कहा – “स्वामीजी ! हम सो समझते थे कि आप वीतराग संन्यासी हैं। सांसारिक सुख-दुःख से ऊपर है। लेकिन आप तो इस नाशवान शरीर के लिए आंसू बहाते हैं, जो आत्मा के निकल जाने पर मिट्टी से भी गया-बीता है।”

 

स्वामीजी उनके तर्क को सुनकर अवाक् रह गये। आवेश में आकर डण्डा उठा पण्डितजी की ओर बढ़े और बोले- “लो आज तुम्हारी परीक्षा है। यह डण्डा तुम्हारी आत्मा को नहीं मारेगा, केवल नश्वर देह को ही मारेगा। यदि यथार्थ में पण्डित हो, तो अपनी जगह से मत हिलना।”

 

फिर क्या था, पण्डित वहां से ऐसे भागे कि घर पहुंचकर ही सांस ली और डण्डे के भय से अपना सारा शास्त्र ज्ञान भूल गये।

5. हत भाग्य सन्तानें

मिस्र के काहिरा शहर में एक बार स्वामी विवेकानन्द रास्ता भूल गये और भटकते-भटकते वेश्याओं के गन्दे मोहल्ले में जा निकले। दुःसंयोग यूं रहा कि वेश्याओं ने ग्राहक समझकर उनका भी आह्वान किया। स्वामीजी निस्संकोच उनके पास गये। किन्तु उन तक पहुंचते-पहुंचते उनके अन्तर्यामी की करुणा आंखों से टपकने लगी थी। रूद्ध कण्ठ से अपने साथियों को सम्बोधित करके स्वामीजी बोले- “ये ईश्वर की हत भाग्य सन्तानें हैं। शैतान की उपासना में भगवान् को भूल गर्यो हैं।”

करुणा-विह्वल स्वामीजी के इस दिव्य रूप को देखकर वेश्याएं भी फूट-फूटकर रोने लगीं। एक सप्ताह बाद ही उस मोहल्ले की वेश्याओं ने अपना समस्त धन लगाकर उस गंदी गली को एक सुन्दर सड़क में परिणत कर लिया और शीघ्र ही वहां एक पार्क, एक मठ और एक महिलाश्रम भी बनाया।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *