स्वामी विवेकानंद जी का सम्पूर्ण जीवन परिचय

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स्वामी विवेकानंद जी का सम्पूर्ण जीवन परिचय

स्वामी विवेकानन्द का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। इनका जन्म 12 जनवरी सन् 1863 ई० पौष संक्रान्ति के दिन कलकत्ता (अब कोलकता) के एक सभ्य एवं सम्पन्न क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी और पिता का नाम विश्वनाथ था। दोनों-माता-पिता- ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। पुत्र के जन्म पर खूब धूमधाम से उत्सव मनाया गया। बालक अपनी मां के ही समान अत्यन्त तेजस्वी और सुन्दर था।

चूंकि अनेक मनौतियों के बाद नरेन्द्र नाथ का जन्म हुआ था, इसलिए यह बालक जो चाहता, सो पाता। परिवार सम्पन्न था। किसी भी इच्छापूर्ति में कोई रुकावट न होती थी। वह निर्भीक थे। डराने-धमकाने का तो उन पर कुछ असर न होता था।

घर का वातावरण बड़ा धार्मिक था। अतएव माता की देखा-देखो नरेन्द्र भी शिव की पूजा करने लगे। मूर्ति के सामने बैठकर आंखें मूंदकर ध्यान- मग्न हो जाते थे।

एक बार जब वह पूजाग्रह में अपने हमजोलियों के साथ ध्यानमग्न थे, एक साथी ने कमरे में एक भयानक सर्प देखा। उसने दूसरे साथियों को बताया। सभी साथी जान बचाकर बाहर भागे, पर नरेन्द्र अडिग रहे। घरवालों को पता लगा। सभी दौड़े आये। उन्होंने भी नरेन्द्र को पुकार-पुकारकर सर्प की बात बतायी, पर नरेन्द्र ज्यों-के-त्यों ध्यानमग्न बैठे रहे। सर्प भी फन ताने पास बैठा रहा। घर के लोग इस विस्मयजनक दृश्य को देखकर चिन्तित थे, पर थोड़ी देर बाद सांप अपने आप चला गया। नरेन्द्र का जब ध्यान टूटा, तो घरवालों से सांप की बात सुनकर उन्होंने कहा- “मुझे तो कुछ पता नहीं, मुझे तो किसी की आहट भी नहीं आयी।”

नरेन्द्र का एक विशेष गुण था कि वह ध्यान के लिए बैठते ही अपनी सारी स्वभावगत वृत्तियों को भूलकर एकाग्र हो जाते थे, अचेतन-जैसी स्थिति में पहुंच जाते थे।

यह बचपन में ही कुशाग्र बुद्धि, साहसी, आस्तिक पाकि देभी थे। उनका शरीर सुगठित एवं शक्तिशाली था।

एक कार जो कुछ भी यह पढ़ या सुन लेते थे, वह उन्हें सहज ही याच सेबा था। विचार गोष्टी की अनेक बातें उन्हें सहज ही स्मरल ही जानी थी यह उनको उद्धत कर लोगों को चकित कर दिया करते थे। कার্কা আগে शक्ति देखकर सभी आश्चर्य करते थे। सबको विश्वास हो गया था कि पक होनहार और प्रतिभाशाली है। पिता विश्वनाथ की भी इसका विश्वास हो गया था कि उनका पुत्र विलक्षण प्रतिभाशाली है। माता प्रसन्न थीं। उनकी विश्वास हो गया था कि वह सचमुच शंकर का दिया गया बरदान है।

बचपन में ऐसा लगता था कि वह किशोर, घमण्डी, उच्छृंखल प्रकृति के है. पर माता-पिता, विशेषरूप से पिता के निर्देशन के कारण नरेन्द्र का जीवन हो परिवर्तित हो गया। पिता ने होनहार बिरवान के पात पहचान लिये थे। समय के साथ नरेन्द्र के व्यक्तित्व का विकास हो गया।

अठारह वर्ष की आयु में नरेन्द्रनाथ प्रेजिडेंसी कॉलेज में भरती हो गये, पर मलेरिया के भयानक प्रकोष के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। इस रोग के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। फलतः उनका एक वर्ष बेकार हो गया। अगले वर्ष असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश लिया और एफ०ए० में पढ़ने लगे। अपने व्यक्तित्व के कारण अपने सहपाठियों और अध्यापकों में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बना लिया। स्पष्टवक्ता नरेन्द्र सच्ची बात को मुंह पर कहने के आदी थे। एफ०ए० के प्रथम वर्ष में ही उन्होंने पश्चिम की प्रमुख सभी दार्शनिक विचारधाराओं को भली प्रकार समझ लिया था।

नरेन्द्र जब भी किसी साधु-संन्यासी, धर्म-प्रचारक या भगव‌द्भक्त में मिलते, तो वे पूछ बैठते-‘क्या आपने ईश्वर का साक्षात्कार किया है?’ इस प्रश्न का सीधा ‘हां’ या ‘न’ में उत्तर कोई न देता। वह सभी शास्त्र-वचनों से समझाने का प्रयत्न करते, पर इससे नरेन्द्र को सन्तोष कहां मिलता था। बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्हें कोई ऐसा महात्मा पुरुष नहीं मिला, जो यह कह सकता कि उसने ईश्वर का साक्षात्कार किया है। उनका मन प्रायः अशान्त रहता था।

नरेन्द्र ने ध्यान लगाना आरम्भ किया, तो इससे उनके मन को बड़ी शान्ति मिली। वे बड़ी सरलता से ध्यान लगा लिया करते थे। समय बीतता गया। नरेन्द्र के मन में सत्य की जिज्ञासा दिनों-दिन बढ़ती ही गयी। कुछ समय उपरान्त नरेन्द्रनाथ ने अनुभव किया कि बिना योग्य गुरु के उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिल सकता है। अतएव वे योग्य गुरु की खोज में लग गये। सौभाग्य से उस समय नरेन्द्र के पड़ोस में सुरेन्द्रनाथ मिश्न नामक एक सज्जन रहते थे। एक दिन वह श्रीरामकृष्ण परमहंस को अपने घर पर आमन्त्रित कर आये। उन्होंने एक सत्संग-गोष्ठी का आयोजन किया। भजन-गायन के लिए उन्हें कोई योग्य व्यक्ति न मिल रहा था। उनको नरेन्द्र का ख़याल आया। वे नरेन्द्र को भजन गायन के लिए बुला लाये। नरेन्द्रनाथ के मधुर कण्ठ से भावपूर्ण गायन सुनकर रामकृष्ण परमहंस बहुत प्रसन्न हुए। परमहंस रामकृष्ण बोले-“तुम तो भजन बहुत अच्छा गाते हो। मेरे निवास स्थान दक्षिणेश्वर मन्दिर में आना। तुम्हारा स्वागत है।” नरेन्द्र ने स्वीकार कर लिया, पर एफ० ए० की परीक्षा के कारण वे जा न सके। एक प्रकार से वह कुछ समय बाद श्रीरामकृष्ण परमहंस का यह निमन्त्रण भी भूल गये।

उचित समय पर एफ०ए० की परीक्षा समाप्त हो गयी, तो नरेन्द्र के पिता के पास कई लड़की वाले रिश्ते के लिए आने लगे। उनमें से विश्वनाथ को एक धनी-मानी परिवार पसन्द आ गया। लड़की के पिता दहेज में नकद दस हजार देने की बात कह गये थे, पर विश्वनाथ पुत्र से बिना पूछे रिश्ता करना नहीं चाहते थे। उन्होंने नरेन्द्र से स्वयं न पूछकर अन्य एक सम्बन्धी द्वारा विवाह करने के सम्बन्ध में जानने का प्रयत्न किया। नरेन्द्र ने परमसत्य को जानने की अपनी विकलता की बात उन्हें बतायी और यह भी कहा कि वह विवाह को इस मार्ग की एक बाधा समझते हैं। रामचन्द्र दत्त लड़की के पिता थे। उनको जब यह पता चला, तो वे नरेन्द्र के पास आये। रामचन्द्र दत्त रामकृष्ण परमहंस के अन्यतम शिष्यों में से थे। उन्होंने नरेन्द्र की परमतत्त्व की जिज्ञासा से उत्पन्न अशान्ति को गम्भीरता से समझकर कहा- “तुम दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास जाओ। वे ही तुम्हें बता सकते हैं।” नरेन्द्र उनकी बात मानकर अपने तीन-चार मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर में रामकृष्ण परमहंस के पास गये।

नरेन्द्र को देखते ही रामकृष्ण परमहंस उनसे इस ढंग से बातचीत करने लगे, जैसे दोनों का काफी पुराना परिचय हो। नरेन्द्र ने वहां कुछ भजन भी सुनाये। फिर नरेन्द्रनाथ को अलग ले जाकर रामकृष्ण परमहंस कहने लगे- “तू इतने दिनों तक मुझे भूला कैसे था! कब से तेरी प्रतीक्षा कर रहा था।” और उनकी आंखों में आंसू उमड़ पड़े। नरेन्द्रनाथ हत्बुद्धि-सा उन्हें देखने लगे। रामकृष्ण अपनी भक्त-मण्डली में लौट गये और सहज भाव से बातचीत करने लगे। नरेन्द्र उनके एकान्त के कथन को मन में रखकर घर लौट आये,

परन्तु उनका असमंजस बराबर बना रहा। अन्ततः उन्होंने यही निश्चय किया कि इस महात्मा का और भी बारीकी से निरीक्षण किया जाये। इस कारण नरेन्द्र बार बार दक्षिणेश्वर जाने लगे। रामकृष्ण के नि:स्वार्थ प्रेम ने नरेन्द्रनाथ की बहुत प्रभावित किया, पर इस प्रबल आकर्षण और प्रभाव के होते हुए भी उनकी दुविधा समाप्त नहीं हुई। मन का संशय, ऊहापोह नहीं मिटा।

एक बार रामकृष्ण अपनी भक्त-मण्डली से घिरे बैठे थे। नरेन्द्र उनके चास जाकर बैठ गये। वह सोच रहे थे कि यदि मेरे प्रश्न का समाधानकारक उत्तर यहां भी नहीं मिला, तो फिर क्या होगा ? अचानक वह उठकर खड़े हो गये। उन्होंने रामकृष्ण से सीधा प्रश्न किया- “क्या आपने ईश्वर को देखा है ?” इस पर रामकृष्ण ने मुसकराते हुए उत्तर दिया- “हां, मैं उसे देखता हूं, जैसे मैं तुम्हें यहां देखता हूं। ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, कोई भी उसे देख सकता है, बात कर सकता है, जैसे मैं तुम्हारे साथ कर रहा हूं। लेकिन ऐसा करने की कौन परवाह करता है? लोग अपनी धर्मपत्नी, बच्चों और धन के हेतु आंसू बहाते हैं, लेकिन ईश्वर के लिए ऐसा कौन करता है? अगर कोई वास्तविक रूप से उसके लिए रोता है, तो वह अवश्य दर्शन देता है।”

परमहंस की इन बातों ने विवेकानन्द को बहुत प्रभावित एवं प्रेरित किया। अब तो नरेन्द्र तीसरे चौथे दिन दक्षिणेश्वर जाने लगे। परमहंस की मण्डली के अधिकांश लोग नरेन्द्र को पहचानने लगे थे। सबको इस बात पर भी बड़ा आश्चर्य था कि परमहंस उस पर कभी नाराज नहीं होते हैं।

एक दिन सन्ध्या समय जैसे ही नरेन्द्र आये कि रामकृष्ण ने अपना दाहिना पैर उनके कन्धे पर रख दिया। चरण रखते ही नरेन्द्र एक विचित्र भावभूमि में पहुंच गये। उन्हें ऐसी अनुभूति हुई, मानो सम्पूर्ण सृष्टि का किसी अनन्त सत्ता में तिरोभाव हो रहा है। नरेन्द्र का’ अहम्’ तब भी रहा। जब उन्हें लगा कि ‘ अहम्’ भी विलीन होने लगा है, तो उनके मुंह से एक दबी चीख निकल गयी-“यह आप क्या कर रहे हैं? मुझे क्या हो रहा है? ओ मां, ओ मेरे पिता…”

रामकृष्ण ने पैर हटा लिया और उनकी छाती पर हाथ रखा। इससे नरेन्द्र तत्काल स्वाभाविक स्थिति में आ गये। देखा, परमहंस उनके सामने खड़े गन्द-यद हंस रहे थे। इस घटना से नरेन्द्र के ‘अहं’ का महल भूमिसात् हो गया।

अचानक सन् 1884 के प्रारम्भ में नरेन्द्र के पिता की मृत्यु हो गयी। उनको इस अचानक मृत्यु से सारे परिवार के सामने विनाश आ खड़ा हुआ।

छह-सात व्यक्तियों के लिए अन्न जुटाने का प्रश्न था, इसके अतिरिक्त कर्जख्वाहों की भीड़ थी। उन दिन से नरेन्द्र को दरिद्रता क ाज्ञान मिला। नौकरी के लिए निरर्थक खोज और मित्रों की विमुखता का भी ज्ञान हुआ। नरेन्द्र आजीविका के लिए अपनी कष्टदायक खोज में लग गये, किन्तु उसमें अपमानजनक व्यवहार के अतिरिक्त उन्हें कुछ नहीं मिला। घोर निराशा की स्थिति में वे संन्यास लेना चाहते थे, किन्तु रामकृष्ण परमहंस के समझाने पर उन्होंने अपना निश्चय बदल दिया। रामकृष्ण ने उनसे कहा- “मैं यह जानता हूं कि तुम संसार में नहीं रह सकते, पर जब तक मैं जीवित हूं, तब तक इसे न छोड़ो, इतना ही मेरा अनुरोध है।”

नरेन्द्र घर लौट आये। फिर उन्हें एक अनुवाद के दफ्तर व एक वकील के कार्यालय से कुछ काम मिल गया था। कोई स्थिर कार्य नहीं मिला था और इसलिए उनके परिवार का भविष्य एक दिन से अधिक के लिए अनिश्चित था। एक दिन उन्होंने स्वामी रामकृष्ण से प्रार्थना की-“मेरी मां और भाई- बहिन बड़े आर्थिक कष्ट में हैं, आप काली मां से उनके लिए कुछ प्रार्थना करें।”

रामकृष्ण ने उत्तर दिया- ‘वत्स! मैं यह प्रार्थनाएं नहीं कर सकता। तुम अपने आप वैसा क्यों नहीं करते?”

नरेन्द्र कुछ नहीं बोले। कुछ देर बाद परमहंस ने कहा- ” आज मंगलवार है। आज रात तू खुद जाकर मां से मांग। जो मांगेगा, वह तुझे मिलेगा।”

नरेन्द्र मां के मन्दिर में गये। वे अपने आपको अत्यन्त प्रसन्न और उत्साहित अनुभव कर रहे थे। मन में प्रेम और विश्वास की धारा बह रही थी। जब वह लौटकर आये, तो रामकृष्ण ने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने कष्टों से मुक्ति के लिए प्रार्थना की या नहीं, तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह भूल गये थे। रामकृष्ण ने उन्हें फिर जाने के लिए कहा। वह दुबारा और तिबारा भी जाकर लौट आये। ज्यों ही वह मन्दिर के अन्दर प्रवेश करते थे, त्यों ही प्रार्थना करने का लक्ष्य उनकी आंखों के आगे से लुप्त हो जाता था। तीसरी बार उन्हें निःसन्देह वहां अपने आने का प्रयोजन स्मरण रहा, परन्तु वह शर्म के मारे कुछ कह न सके। यह कितना क्षुद्र स्वार्थ है। इसके लिए मैं मां से प्रार्थना करूं… नहीं-नहीं… और इसके स्थान पर उन्होंने प्रर्थाना की “मां! विवेक दो, ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो।”

मन्दिर से लौटकर नरेन्द्र सीधे रामकृष्ण के पास पहुंचे और बोले- “यह सब कुछ मुझसे नहीं होता। अब आपको ही मेरे लिए मां से प्रार्थना करनी होगी।”

इस पर रामकृष्ण बोले-“क्या करूं रे! मैं किसी के लिए भी ऐसी प्रार्थना आज तक कभी नहीं कर सका। इसीलिए तो तुमसे कहा कि तू मां के पास जाकर जो चाहे, सो मांग ले। मां तुझे वह वस्तु अवश्य ही देगी, पर तुझे इतनी सीधी-सी बात भी करते नहीं बनी। तेरे भाग्य में संसार सुख नहीं है, उसमें मैं भी क्या करूं? तेरा जन्म मनुष्य जाति के कल्याण के लिए हुआ है। इसके लिए तुझे कष्ट भी उठाने होंगे। पर जा, तुम लोगों को रूखे-सूखे अन्न और मोटे वस्त्र की कमी नहीं रहेगी।” और तब से उनकी सभी कठिनाइयां किसी-न-किसी तरह दूर होती गयीं।

किसी तरह गृहस्थी की गाड़ी को ठीक-ठाक चलती हुई देखकर नरेन्द्र निश्चिन्त हुए और साधन, भजन, ग्रन्थ पाठ आदि में उनका बहुत-सा समय बीतने लगा।

सन् 1885 में रामकृष्ण के गले में एक विचित्र रोग हो गया और उस समय से लगभग डेढ़ वर्ष तक वे प्रायः रुग्णशय्या में ही रहे। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, तब भी उनका उत्साह ज्यों का त्यों बना रहा और उन्होंने अपनी बीमारी की अवस्था में ही अपने भक्तगणों को एकत्रित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। दिनों-दिन उनकी हालत नाजुक होती गयी। सन् 1885 दिसम्बर के मध्य में उन्हें कोसीपुर के सुरम्य उद्यान में ले जाया गया और अपने जीवन के शेष अन्तिम आठ मास उन्होंने वहीं पर व्यतीत किये। उनके चुने हुए बारह अन्तरंग शिष्य क्रमशः नरेन्द्र, राखाल, बाबूराम, निरंजन, योगीन, लाटू, तारक, दोनों गोपाल, काला, शशि और शरत् अन्त समय तक उनके साथ रहे। नरेन्द्र उनके समस्त कार्यों व उपासना आदि धार्मिक कृत्यों की देखभाल करते थे।

एक दिन रामकृष्ण ने नरेन्द्र से कहा- “मैं इन तरुण युवकों को तुम्हारे

सुपुर्द करता हूं। तुम इनकी आध्यात्मिकता को उन्नत करने में लग जाओ।” रामकृष्ण का अन्त समय जितना ही निकट आता जाता था, वह उतने ही निर्लिप्त होते जाते थे और अपने शिष्यों की वेदना के ऊपर अपनी शान्ति के स्वर्ग को बिछा रहे थे।

रामकृष्ण ने अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व अपनी सम्पूर्ण शक्तियां विवेकानन्द को सौंपते हुए कहा – “ओ नरेन्द्र ! आज मैंने अपना सब कुछ तुम्हें दे दिया है और मैं भिखारी हो गया हूं। इस शक्ति को लेकर तुम महान् कार्य करोगे और उसके पश्चात् तुम उस जगह वापस जाओगे, जहां से तुम आये हो।”

उसी क्षण से उनकी सारी शक्तियां नरेन्द्र के अन्दर संक्रान्त हो गयीं। गुरु और शिष्य एक हो गये। नरेन्द्र ने संन्यास ग्रहण कर लिया।

अगस्त महीने की 14 तारीख को रामकृष्ण का रोग बहुत चढ़ गया। बिस्तर के आसपास लोग स्तब्ध बैठे थे। नरेन्द्र उनके विल्कुल समीप बैठे थे।

15 अगस्त प्रात: पांच बजे के करीब श्रीरामकृष्ण का शरीर ठण्डा पड़ने लगा, तथापि कमर का भाग गरम लगता था। इसलिए कोई नहीं समझता था कि यह ‘महासमाधि’ है। पहले कुछ लोग अन्य डॉक्टरों को लाने चले गये थे। डॉक्टर सरकार आये और सब लक्षणों को देखकर उन्होंने इसे ‘ महासमाधि’ ही बताया। डॉक्टर सरकार के जाने के बाद वहां कुछ संन्यासी आये और उन्होंने भी सब लक्षणों को देखकर इसको ‘महासमाधि’ ही बताया।

यह सुनकर भक्त-मण्डली को दशो दिशाएं शून्य मालूम पड़ने लगीं। उन लोगों को इस विस्तृत जगत् में अकेले छौड़कर उनके इहलोक और परलोक के आधार, उनके सर्वस्व, उनके देवाधिदेव सदैव के लिए चले गये।

यह दुखद समाचार सवेरे सारे शहर में फैल गया था। प्रात:काल ही नीचे की मंजिल की बैठक में एक सुन्दर विमान बनाकर उसे पुष्पमालादि से सजाकर उस पर रामकृष्ण के शरीर को रख दिया गया। उस महापुरुष के अन्तिम दर्शन करने के लिए चारों ओर से झुण्ड-के-झुण्ड लोग इकट्ठे होने लगे। सन्ध्याकाल तक लोगों की लगातार भीड़ लगी हुई थी। सन्ध्या समय रामकृष्ण के पार्थिव शरीर का अग्निसंस्कार करने के लिए जनसमूह रवाना हुआ। सभी काशीपुर के घाट पर पहुंचे। वहां कुछ समय तक भजन आदि होने के बाद चन्दन और तुलसी के काष्ठ की चिता पर रामकृष्ण का शरीर स्थापित किया गया और थोड़ी देर में अग्निदेव ने अपना काम समाप्त कर दिया।

सन् 1885 में रामकृष्ण के निधन के बाद नरेन्द्रनाथ ने अपने साथियों के साथ एक मठ का निर्माण करने का निश्चय किया और बैरनगोर में एक मकान किराये पर लेकर अपने साथियों के साथ रहना आरम्भ कर दिया। नरेन्द्रनाथ तरुण संन्यासी गुरुभाइयों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ थे। अपने साथियों का नेतृत्व उन्होंने संभाला। आदर्श के प्रति निष्ठा बनी रहे, त्याग का संकल्प दृढ़ रहे, लक्ष्य की प्राप्ति हो सके, इन सभी आवश्यकताओं को नरेन्द्रनाथ बड़ी तीव्रता से अनुभव कर रहे थे। नरेन्द्रनाथ गुरुभाइयों के उत्साह को निरन्तर बनाये रखने में संलग्न थे।

सन् 1887 ई० में इस मठ के 12 सदस्यों ने पहली बार वैदिक क्रियाओं के अनुसार संन्यास ग्रहण किया और अपने नाम बदल लिये। उसी समय चिन्तन आलोचन एवं विवेचन की प्रवृत्ति के कारण नरेन्द्रनाथ दत्त का नाम ‘स्वामी विवेकानन्द’ रखा गया। स्वामी विवेकानन्द ने भारत की ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति का मार्गदर्शन किया।

नाम परिवर्तन के बाद उन्होंने अपनी यात्रा आरम्भ कर दी। अपने अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व के कारण स्वामी विवेकानन्द जहां कहीं भी जाते, जनता आकृष्ट हो जाती। बिहार तथा उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण कर वे काशी पहुंचे। काशी में वह द्वारकादास के आश्रम में रहते थे। भिक्षा से प्राप्त भोजन, देव-स्थानों का दर्शन, शास्त्र चर्चा, ध्यानोपसाना ही उनकी दिनचर्या थी।

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी तीर्थयात्रा का श्रीगणेश काशी से ही किया। सन् 1888 के अगस्त मास में दण्ड-कमण्डल लेकर वह उत्तर भारत के अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए सरयू नदी के तट पर अवस्थित अयोध्या पहुंचे। यहां सत्संग-भजन में कुछ दिन बिताकर पैदल लखनऊ और आगरा होते हुए वृन्दावनधाम पहुंचे। वहां कालाबाबू के कुंज में अतिथि रूप में रहने लगे। मथुरा-वृन्दावन के निकटवर्ती अनेक तीर्थों का भ्रमण करने लगे। यहीं पर राधाकुण्ड में आकर स्वामीजी को एक अपूर्व अनुभव हुआ।

यहां से वे हाथरस गये। हाथरस में शरच्चन्द्र उनके शिष्य बने। शरच्चन्द्र के साथ यात्रा करते-करते स्वामीजी ऋषिकेश आ पहुंचे। दीक्षा के उपरान्त शरच्चन्द्र का नाम सदानन्द हो गया।

1889 के फरवरी मास में स्वामी अपने गुरुदेव की जन्मभूमि कामार- पुकुर तथा गुरुमाता की जन्मभूमि जयराम बाटी गये थे और शिमुलतला में रहकर जुलाई में लौट आये। वेदान्त और उपनिषदों के गम्भीर अध्ययन में लग गये।

दिसम्बर में स्वामीजी वैद्यनाथ धाम गये। वहां से काशी होकर 22 जनवरी, 1890 को गाजीपुर पहुंचे। गाजीपुर में समाचार मिला कि काशी में स्वामी अभेदानन्दजी अस्वस्थ हैं। तुरन्त काशी चले गये और अभेदानन्दजी की चिकित्सा की समुचित व्यवस्था की।

कुछ दिनों बाद स्वामीजी को परमहंस के एक गृहस्थ भक्त बलराम वसु के परलोक-गमन का समाचार मिला। इसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें परमहंस के गृहस्थ शिष्य सुरेशचन्द्र मित्र के भी देहान्त का समाचार मिला। स्वामीजी को इन दोनों के निधन पर भारी दुःख हुआ। वे उदास हो उठे। इससे सम्पूर्ण  भारत की यात्रा कर अपने धर्म-बन्धुओं से साक्षात्कार करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। वे भारतीय जनता का साक्षात्कार कर उसके सुख-दुःख, दैन्या गौरव, आशा-आकांक्षा को आंखों देखना, कानों सुनना चाहते थे। वे अनुभव कर रहे थे कि विशाल देश को जाने बिना कोई सार्वदेशिक कार्य-योजना नहीं बनाई जा सकती।

 

सन् 1893 ई० में स्वामी विवेकानन्द ‘विश्वधर्म सम्मेलन’ में भाग लेने शिकागो गये। शिकागो सम्मेलन के पहले दिन उन्हें सबसे अन्त में बोलने का अवसर दिया गया। सबसे अन्त में उन्हें इस कारण रखा गया था कि जनता के लिए वह कोई विशेष आकर्षण नहीं थे। उन्हें केवल पांच मिनट का समय दिया गया था, जिसमें उन्हें अपने विचार रखने थे।

 

स्वामीजी ने अपना भाषण प्रारम्भ किया। उन्होंने कहा- “अमरीका के मेरे भाइयो और बहनो !” उनके पहले वाक्य ने ही लोगों का मन जीत लिया। उनसे पहले पांच प्रतिनिधि बोल चुके थे। किसी ने भी लोगों को प्यार से भाई-बहन नहीं कहा था। लोग मन्त्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। कई घण्टे बीत गये और श्रोता रस के सागर में डूबे रहे।

 

विश्वधर्म सम्मेलन सत्रह दिन तक चला और स्वामीजी ने इसमें दस- बारह बार अपने विचार प्रकट किये। स्वामीजी ने वहां हिन्दू वेदान्त दर्शन की विस्तृत व्याख्या तथा वेदान्त की विश्व-धर्म के रूप में घोषणा की। ‘द न्यूयार्क हेराल्ड’ नामक पत्र ने उनके सन्दर्भ में लिखा था- धर्मों की संसद में सबसे महान् व्यक्ति विवेकानन्द हैं। उनकौ भाषण सुन लेने पर अनायास यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए धर्म प्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण है। अमरीका में विवेकानन्द को ‘तूफानी हिन्दू’ कहा गया।

 

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता को सम्पूर्ण विश्व के सामने स्थापित करके उसे ईसाई तथा इस्लाम धर्म के आक्रमणों से बचाया।

 

स्वामी विवेकानन्द सभी धर्मों की एकता में विश्वास रखते थे। ‘शिकागो’ में अपने अन्तिम भाषण में उन्होंने कहा था-“एक ईसाई को हिन्दू या बौद्ध बनने की आवश्यकता नहीं है और एक हिन्दू या बौद्ध को ईसाई बनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक को एक-दूसरे की सत्य भावना को समझना चाहिए और पृथक् व्यक्तित्व की रक्षा करते अपनी स्वयं की प्रगति के कानून द्वारा अपना विकास करना चाहिए।”

धर्म सम्मेलन के समापन के बाद स्वामीजी अमरीका में एक वर्ष और के कई जगहोंने दिये और आनेको उनके किस देश में स्थानी विवेकलाद को चालिसकेका को के कारण भारत में जोश उमड़ आया। भारत का चम भवाने फिर से और अमरीका से कोलम्बो प हुआ। स्वाभोजो जाएं-जहां भी परे, लोगों ने ‘हिन्दुत्व का महान् रक्षक’ कहकर उनका स्थापण किया।

आपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों-शिक्षाओं एवं विचारों को साकार करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने अपने शिष्यों एवं साथियों को सहायता से 1 मई 1997 को ‘रामकृष्ण मिशन’ को स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य रामकृष्ण के जोवन तथा उनको शिक्षाओं का वेदान्तिक धर्म के प्रकाश में प्रचार करना और भिन्न-भिन्न धर्म के मानने वालों में मित्रता स्थापित करके जाति-पाति के भेदभाव के बिना जनसेवा करना था। ‘रामकृष्ण मिशन’ भारत, पाकिस्तान, बर्मा सोलोन, मलाया, फिजी मारिशस, अमेरिका तथा यूरोप आदि देशों में आज भी बाढ़ पीड़ितों को सहायता, चिकित्सा सेवा, शिशु पालनगृह अनाथालय, कॉलेज, विद्यार्थियों के लिए छात्रावास तथा औद्योगिक केन्द्र खोलना आदि कार्यक्रम सफलतापूर्वक चला रहा है।

रामकृष्ण मिशन को स्थापना के लगभग दो वर्ष बाद स्वाभोजो पुनः विदेश यात्रा पर गये और उन्होंने वहां को रामकृष्ण की संस्थाओं को शाखाओं का निरीक्षण किया। अमरीका के अतिरिक्त इस बार उन्होंने इंग्लैण्ड, फ्रांस, आस्ट्रिया, बलकान राज्य, ग्रीस तथा मित्र का भी भ्रमण किया। अपनी इस यात्रा से स्वामीजी 1 दिसम्बर, 1900 को भारत लौटे।

स्वामी विवेकानन्दजी का कहना था कि कोई कितना भी महान् क्यों न हो, अन्चे की तरह कभी उसके पोछे न चलो। यदि तुम्हारे पास ज्ञान है, तो उस ज्योति से बुझे दीपकों को जलने दो, ताकि तुम्हारे ज्ञान का प्रकाश अधिकाधिक व्यापक एवं विस्तीर्ण होता चला जाये।

यादि इस धरा पर कोई पुण्य भूमि है-जहां मानव ने सर्वाधिक विनम्रता, उदारता, शुद्धता, शान्ति, आत्मविश्लेषण की क्षमता और अध्यात्मिकता पायो- वह है भारत ।

हम हो संसार के ऋणो हैं, संसार हमारा ऋणी नहीं है। यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमें संसार में कुछ करने का अवसर मिलता है। संसार की सहायता करने से हम वास्तव में स्वयं अपना ही कल्याण करते हैं।

मनुष्य ही परमात्मा का सर्वोच्च साक्षात् मन्दिर है। इसलिए इस साकार देवता की ही पूजा की जानी चाहिए। ईश्वर की प्राप्ति खुद ही हो जायेगी।

भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं-सेवा और त्याग। इन्हीं मागाँ से उसकी भावनाओं को तीव्र करो। शेष सब अपने आप ठीक हो जायेगा। सुख आदमी के साथ आता है, तो दुःख का मुकुट पहनकर। जो उसका

स्वागत करता है, उसे दुःख का भी स्वागत करना चाहिए। जीवन संघर्ष तथा निराशाओं का अविरात प्रवाह है। जीवन का रहस्य भोग में नहीं, अनुभवजनित शिक्षा में है, पर खेद है कि जब हम वास्तव में सीखने लगते हैं, तभी हमें संसार से चल बसना पड़ता है।

चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है, शक्ति है। उसकी संरक्षा आवश्यक है। राष्ट्र की मजबूती के लिए चारित्रिक बल परमावश्यक है।

मानव समाज से धर्म को निकाल दो, फिर शेष क्या बचेगा ? पशुओं से भरे जंगल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

इन्द्रिय-सुख को मानवता का चरम लक्ष्य मानना महज मूर्खता है, मानव जीवन का लक्ष्य ज्ञान है।

सम्पूर्ण ज्ञान-राशि का उपयोग मानव की सुख-सुविधा के लिए नहीं, अपितु मानव को पशुत्व की श्रेणी से उठाकर देवत्व की श्रेणी में लाने के लिए होना चाहिए।

मनुष्य जितना अधिक स्वार्थी होता है, उतना ही अधिक अनैतिक बन जाता है। यदि तुम्हारा अहंकार चला गया है, तो किसी भी धार्मिक पुस्तक की एक पंक्ति भी पढ़े बिना व किसी भी देवालय में पैर रखे बिना, तुम जहां बैठे हो

, वहीं मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।

मनुष्य में जो स्वाभाविक बल है, उसकी अभिव्यक्ति धर्म है। नास्तिक वह है, जो अपने में विश्वास नहीं करता।

विवेकानन्दजी के विचार न तो भौतिकता का सीधे-सीधे खण्डन करते हैं, न ही केवल आध्यात्मिकता का उपदेश देते हैं, बल्कि इन दोनों के समन्वय पर आधारित एक ऐसी जीवन पद्धति की बात करते हैं, जो इस वैज्ञानिक युग में मानवीय जीवन के लिए सबसे अधिक उपयोगी हो सकती है। एक प्रकार से उन्होंने भौतिकता के जाल में फंसकर तड़पते हुए मानव को मुक्ति का रास्ता दिखाया।

कठिन परिश्रम और विश्राम की कमी के कारण स्वामीजी का शरीर निरन्तर क्षीण होता जा रहा था। जीवन के अन्तिम दो वर्षों में उनका अधिकांश समय कलकत्ता के बेलूड़ मठ में व्यतीत हुआ।

4 जुलाई, 1902 की प्रभात नित्य नियमानुसार सुबह स्वामीजी सम्मिलित ध्यान में उपस्थित नहीं हुए। दूसरे दिन शनिवार और अमावस्या तिथि थी। उन्होंने भठ में काली पूजा करने की इच्छा व्यक्त की। थोड़ी-सी चाय पीकर चे मठ के ठाकुरघर में प्रविष्ट हुए। लोगों ने देखा कि ठाकुरघर के सभी द्वार और खिड़कियां बन्द हैं। सभी विस्मित थे कि पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था। तीन घण्टे का समय बीत जाने पर भजन गुनगुनाते वे प्रांगण में टहलने लगे। भोजन की घण्टी बजी, तो स्वामीजी सबके साथ एकत्र भोजन करने बैठे। प्रायः अपने ही कमरे में भोजन कर लेते थे। उन्हें साथ बैठे देखकर सभी प्रसन्न हुए। भोजनोपरान्त कुछ विश्राम कर उन्होंने ब्रह्मचारियों को संस्कृत की कक्षा में बुला लिया। पहले ये कक्षा तीन बजे लगती थी। आज सवा बजे ही पाठ प्रारम्भ हो गया। तीन घण्टे वे व्याकरण पढ़ाते रहे।

इसके बाद स्वामी प्रेमानन्दजी को साथ लेकर घूमने निकले। वापस आकर बरामदे में बैठे और इधर-उधर की बातें करते रहे। सन्ध्या आरती का समय हुआ। सभी ठाकुरघर की ओर चले और स्वामीजी दुमंजिले पर अपने कमरे में आ गये। एक ब्रह्मचारी को, जो सदा स्वामीजी के साथ रहते थे, स्वामीजी ने अपने कमरे की सभी खिड़कियां और दरवाजे खोलने का आदेश दिया। वे खिड़की के पास खड़े देखते रहे। ब्रह्मचारी को बाहर बैठ जप करने का आदेश देकर स्वयं भी पद्मासनस्थ होकर जप करने लगे। कोई घण्टे बाद वे उठकर लौट गये और ब्रह्मचारी को पंखा झलने के लिए कहा। जपमाला हाथ में लिये वे सोये हुए थे, निस्पन्द व स्थिर। एकाएक उनका हाथ कांप उठा और अस्पष्ट स्वर में कुछ कहराने का-सा शब्द हुआ। एक दो लम्बी सांसें आर्यों और उनका सिर सिरहाने सरक गया।

यशस्वी मनीषी स्वामी विवेकानन्दजी का 5 जुलाई 1902 में मात्र 39 वर्ष की उम्र में तिरोधान हो गया। सच पूछा जाये, तो जो काम स्वामीजी कर गये हैं, वह एक महान् कर्मयोगी के लिए ही सम्भव है।

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