5 कहानी जो आपकी जीबन को बदल देगी


1. वेदान्त प्रचार की प्रणाली


स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से अनेक कर्मवीर, भारतीय वेदान्त के प्रचार के लिए अमेरिका जाते थे। एक दिन एक संन्यासी सिस्टर निवेदिता के पास आये तथा अमेरिका में वेदान्त प्रचार की प्रणाली पर जिज्ञासा प्रकट की। निवेदिता ने एक क्षण सोचा, फिर संन्यासो से एक चाकू की प्रार्थना की, जो उनके पास रखा हुआ था। संन्यासी ने फौरन धार वाले भाग को स्वयं पकड़कर काठ वाला भाग निवेदिता की ओर कर दिया। “बिल्कुल ठीक!” सिस्टर निवेदिता बोलो “विदेश में कार्य करने को उचित शैली यही है। संकटों के सामने स्वयं रहो तथा सुरक्षित भाग दूसरों के लिए छोड़ दो।”

2. जब चोर चरणों में गिर पड़े

एक दिन मध्यरात्रि को सन्त अघोरनाथ के पिता यादवचन्द्र राय के घर में चोर घुस आये। उन्होंने सभी वस्तुओं को अस्त-व्यस्त कर डाला, किन्तु उन्हें मतलब की वस्तु न मिल पायी। इसी बीच महाशय की नींद खुल गयी। बोरों के काम में विघ्न न डालते हुए, वे अपना हुक्का लेकर चुपचाप बैठ सबै चोर जब निराश होकर लौटने लगे, तो उन्होंने कहा- ” भाइयो! आप लोगों को कष्ट बहुत हुआ, किन्तु लाभ कुछ नहीं हुआ। अतः जाने ये पूर्व स्कान तो मिटाते आइये।” और हुक्का चोरों की ओर बढ़ा दिया। वे सभी पानी-पानी हो गये और उनके चरणों में गिर पड़े।

 3. हार्दिक इच्छा

एक दिन मैसूर नरेश कहने लगे, “स्वामीजी ! मेरी हार्दिक इच्छा है कि आपके लिए कुछ करूं। आप तो कुछ भी स्वीकार नहीं करते। आपके मनोनुकूल कुछ कर पाता, तो अपने तो धन्य समझता।”

“स्वामीजी ने कहा, “इस समय देश को इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि पश्चिम में विज्ञान की जो उन्नति हुई है, उसके आधार पर देश की आर्थिक और सामाजिक उन्नति की जाये। उन्नत वैज्ञानिक प्रणाली से कृषि, शिल्प आदि की शिक्षा भी हम उनसे लें, पर इसके बदले में हमें भी उन्हें कुछ देना चाहिए। हमारे पास देने के लिए कोई भौतिक सम्पदा तो है नहीं। हम उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान अवश्य दे सकते हैं। यही सोचकर कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि धर्म-प्रचार के लिए पश्चिम देशों में जाऊं। मेरे विचार से यह आदान-प्रदान पूर्व और पश्चिम दोनों के लिए कल्याणकारी होगा। आप साधन-सम्पन्न प्रभावशाली लोग यदि इस कार्य के लिए यत्ल करें, तो हो सकता है। यही मेरी हार्दिक इच्छा है।”

4.अचेतन

एक बार जब नरेन्द्र पूजागृह में अपने हमजोलियों के साथ ध्यानमग्न था, एक साथी ने कमरे में एक भयानक सर्प देखा। उसने दूसरे साथियों को बताया। सभी साथी जान बचाकर बाहर भागे, परन्तु नरेन्द्र अडिग रहा। घरवालों को पता लगा। सभी दौड़े आये। उन्होंने भी नरेन्द्र को पुकार-पुकारकर सर्प की बात बतायी, परन्तु नरेन्द्र ज्यों-का-त्यों ध्यानमग्न बैठा रहा। सर्प भी फन ताने पास बैठा रहा। घर के लोग इस विस्मयजनक दृश्य को देखकर चिन्तित थे, पर थोड़ी देर बाद सांप अपने-आप चला गया। नरेन्द्र का जब ध्यान टूटा, तो घरवालों से सांप की बात सुनकर उसने कहा- ‘मुझे भी कुछ पता नहीं, मुझे तो किसी की आहट भी नहीं आयी।’

रेन्द्र का एक यह विशेष गुण था कि वह ध्यान के लिए बैठते ही अपनी सारी स्वभावगत वृत्तियों को भूलकर एकाग्र हो जाता था, अचेतन-जैसी स्थिति में पहुंच जाता था।

5. निडरता

वास्तव में, नरेन्द्र को तो डर छू तक नहीं गया था। वह किसी से भी नहीं डरता था। वह भूत-प्रेत से भी भय नहीं मानता था। जिद्दीपन भी उसमें था। अपनी बात पर वह अड़ जाता था। वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट भी था। इस कारण वह अपने हमजोलियों का सहज हो अगुवा बन गया था। वहीं सबका नेता था।

पड़ोस में एक साथी का घर था। उसके घर में चंपा का एक पेड़ था। नरेन्द्र इस पेड़ पर चढ़ जाता और जांघों की कैंची बना पेड़ की डाल को जकड़कर उलटा झूलने लगता था। एक दिन नरेन्द्र इसी तरह चमगादड़-जैसा उलटा लटका एक ऊंची डाल से झूल रहा था। घर के मालिक महाशय ने जब देखा, तो डर के मारे कांप उठे। यदि यह बालक गिर पड़े, तो इसका सिर फट जायेगा। बालक को डराने के लिए सोचकर उन्होंने कहा – “बेटा! आगे से इस पेड़ पर कभी न चढ़ना। इस पर ब्रह्मराक्षस रहता है। (साथ ही ब्रह्मराक्षस के विकराल रूप का भी वर्णन उन्होंने किया) इसलिए यदि कोई इस पर चढ़ता है, तो ब्रह्मराक्षस को क्रोध आ जाता है।” नरेन्द्र को चुप देखकर उन्होंने समझा बच्चे पर असर हुआ है, पर उनके जाते ही नरेन्द्र फिर पेड़ पर चढ़ बैठा और साथियों से कहने लगा-‘आज तो ब्रह्मराक्षस को देखकर हो जाऊंगा।’ साथी डर गये। ‘न बाबा, ब्रह्मराक्षस हमें मार डालेगा।’ नरेन्द्र ने हंसते हुए कहा- “अरे! ये सब बातें हम लोगों को डराने के लिए कही जाती हैं। ब्रह्मराक्षस को आज तक किसी ने देखा भी है?”

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