3 story of vivakananda

1. मां की सेवा

इस जगत् में यदि मैं किसी से प्यार करता हूं, तो वह है, मेरी मां। मेरी मां-जिसने अपनी तमाम सांसारिक यन्त्रणाओं के बीच भी मेरे प्रति स्नेहमयी बनी रहकर मुझे सम्पूर्ण मानव जाति को प्यार करना सिखाया।

उसका सारा जीवन कष्टमय रहा है। मेरा मंझला भाई जब से घर खेड़कर निकला है, मां का हृदय विदीर्ण हो गया है। मेरा सबसे छोटा भाई इस योग्य नहीं दिखता कि वह घर चलाने लायक कुछ सन्तोषजनक उपार्जन कर सकें। और अपने सबसे प्यारे बेटे को-जिसे वह अपना एकमात्र ‘भरोसा समझती थी-ईश्वर और मानव-जाति की सेवा में अर्पित कर दिया। मैंने अपनी मां का समुचित ध्यान नहीं रखा। अब मेरी एक ही आखिरी इच्छा है कि मैं शेष समय मां के साथ रहकर उसकी सेवा-सुश्रूषा में लगाऊं। इससे निश्चित ही मेरे और मां के अन्तिम दिन सहजता में बीतेंगे।

श्री शंकराचार्य को भी ठीक यही करना पड़ता था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे मां के पास लौट गये थे। मैं भी जीवन के शेष दिन मां के साथ उनकी सेवा में गुज़ारना चाहता हूं।

2. पाप और पुण्य

(जयपुर के महाराज अजितसिंह को लिखे स्वामी विवेकानन्द के एक मन्त्र का अंश)

सन् 1899 में, कलकत्ता में भयंकर प्लेग फैला हुआ था। शायद ही कोई ऐसा घर बचा था, जिसमें रोग का प्रवेश न हुआ हो। स्वामी विवेकानन्द, उनके कई शिष्य तथा गुरु भाई स्वयं रोगियों की सेवा-सुश्रूषा करते रहे, स्वयं हाथों से नगर की गलियां और बाज़ार साफ़ करते रहे। तभी कुछ पण्डितों की मण्डली स्वामीजी से मिली।

पण्डितों ने उनसे कहा – “स्वामीजी आप यह कार्य ठीक नहीं कर रहे हैं। पाप बहुत बढ़ गया है, इसलिए इस महामारी के रूप में भगवान् लोगों को दण्ड दे रहे हैं। आप लोगों को बचाने का यत्न कर रहे हैं। ऐसा करके आप भगवान् के कार्यों में बाधा डाल रहे हैं।”

स्वामीजी ने उत्तर दिया -“पण्डितगण ! मनुष्य तो अपने कर्मों के कारण

कष्ट पाता ही है। लेकिन कष्ट से मुक्त कराने वाला अपने पुण्य को पुष्ट करता है, जिस प्रकार उनके भाग्य में दुःख पाना, कष्ट पाना बदा है, उसी प्रकार  इन कार्यकर्ताओं के भाग्य में रोगियों का कष्ट दूर करके पुण्य अर्जित करना बदा है।”

3.  कपड़े ही सज्जनता की कसौटी

काषाय-वस्त्र, सिर पर पगड़ी, हाथों में डण्डा, कंधों पर चादर डाले, स्वामी विवेकानन्द शिकागो (अमेरिका) की सड़कों से गुज़र रहे थे। उनकी यह वेशभूषा अमेरिका निवासियों के लिए कौतूहल की वस्तु थी। पीछे-पीछे चलने वाली एक महिला ने अपने साथ के पुरुष से कहा- “ज़ा इन महाशय को तो देखो, कैसी अनोखी पोशाक है।”

स्वामीजी को समझते देर न लगी कि ये अमेरिका-निवासी उनको भारतीय वेशभूषा को हेय नज़रों से देख रहे हैं। वे रुके और पीछे-पीछे आने बाली उस भद्र महिला को सम्बोधित कर बोले-“अहिन! मेरे इन कपड़ों को देखकर आश्चर्य मत करो। तुम्हारे इस देश में कपड़े ही सज्जनता की कसौटो हैं, पर मैं जिस देश में आया हूं, वहां सज्जनता की पहचान मनुष्य के कपड़ों से नहीं, उसके चरित्र से होती है।”

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